लोकसभा में RTI Amendment Bill 2019 Pass पक्ष में पड़े 218 और विरोध में 79 वोट बीती शुक्रवार को लोकसभा में किया गया था पेश
नई दिल्ली।लोकसभा में कई विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद सोमवार को सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 ( RTI Amendment Bill 2019 ) पास हो गया। बिल के समर्थन में 218 सांसदों ने वोट किया जबकि विरोध में 79 वोट पड़े।
बता दें कि इससे पहले बीती शुक्रवार को मोदी सरकार की तरफ से इस बिल को लोकसभा में पेश किया गया था। इस दौरान कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी, शशि थरूर, तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय और AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस बिल का विरोध किया था।
सोमवार को बिल ( RTI Amendment Bill 2019 ) पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा कि RTI कानून के बारे में विपक्ष की चिंताएं बेमतलब की हैं। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार पारदर्शिता, जन भागीदारी, सरलीकरण, न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन को लेकर प्रतिबद्ध है।
जिसके बाद एमआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी समेत कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने विधेयक पर विचार किए जाने की बात कही। इसके पारित किए जाने का विरोध किया और मतविभाजन की मांग की।
विपक्ष का विरोध
विपक्ष ने आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार सूचना का अधिकार कानून बिल को कमजोर करना चाहती है। कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि इस बिल के संशोधन से इसकी स्वायक्ता खत्म हो जाएगी।
ये विधेयक केंद्रीय सूचना आयोग की स्वतंत्रता को खतरा पैदा करता है। इस विधेयक के माध्यम से मोदी सरकार सूचना के अधिकार का हनन करने की कोशिश कर रही है।
वहीं, कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने कहा, ' यह विधेयक RTI को समाप्त करने वाला विधेयक है। सामाजिक कार्यकर्ता भी इस कानून में बदलाव की आलोचना कर रहे हैं।
डीएमके नेता ए राजा ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार संख्याबल का इस्तेमाल लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
क्या है सूचना का अधिकार
सूचना का अधिकार देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। देश का हर नागरिक सरकार या कुछ मामलों में निजी संस्थाओं तक से सूचनाएं मांगने के निवेदन करने का अधिकार रखता है।
वहीं, सरकार का भी कर्तव्य है कि वह निवेदित सूचनाओं को उपलब्ध कराए, बशर्ते उन सूचनाओं को सार्वजनिक न करने वाली सूचनाओं की श्रेणी में न रखा गया हो।
भारतीय संविधान विशिष्ट रूप से सूचना के अधिकार कानून का उल्लेख नहीं करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने काफी पहले ही इसे एक ऐसे मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दे दी थी जो लोकतांत्रिक कार्य संचालन के लिए जरूरी है।