बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि दिल्ली के राजघाट के अलावा महात्मा गांधी की अस्थियां उत्तर प्रदेश के रामपुर में भी दफन हैं।
रामपुर। 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जहां देशभर में सरकारी छुट्टी रहती है तो वहीं स्कूल-कॉलेजों में कई तरह के कार्यक्रम मोहनदास करमचंद गांधी को सम्मान में रखे जाते हैं। वहीं बहुत कम लोग ये बात जानते होंगे कि दिल्ली के राजघाट के अलावा महात्मा गांधी की अस्थियां उत्तर प्रदेश के रामपुर में भी दफन हैं।
इन अस्थियों को रामपुर के तत्कालीन नवाब रहे रजा अली खान बापू के परिवार से मांग कर यहां लाएं थे। इन अस्थियों को उन्होंने रामपुर में दफन करके उनकी समाधि बनवाई थी। बाद में पूर्व मंत्री रहे मोहम्मद आजम खां ने करोड़ों रुपये लगाकर इस समाधी को इतना भव्य और सुंदर बना दिया कि अब यह समाधी पर्यटक स्थल में तब्दील होने लगी है।
बता दें कि 10 फरवरी सन 1948 को तत्कालीन नवाब रजा अली खान अपने परिवार के साथ कुछ विद्वानों को लेकर अपनी पर्सनल बोगी से दिल्ली पहुंचे। बाद में उन्होंने बापू के परिवार से उनकी कुछ अस्थियां मांगी। जिसको लेकर पहले तो परिवार ने मना कर दिया। लेकिन जब नवाब के साथ गए कुछ विद्वानों ने बापू परिवार के सदस्यों को कुछ ऐसे तर्क दिए जिन्हें सुनने के बाद बापू परिवार के सदस्य देवदास गांधी ने बापू की कुछ अस्थियां सौंप दी।
इसके बाद 11 फरवरी 1948 को नवाब रजा अली खान पूरी शानोशौकत के साथ अपनी बोगी से अस्थियों को अष्ट धातु के कलश में रख कर रामपुर के लिए निकले। कहा जाता है कि दिल्ली से रामपुर तक जिस-जिस स्टेशन पर उनकी बोगी रुकी, वहां-वहां बापू की अस्थियों का स्वागत लोगों ने किया।
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12 फरवरी 1948 को जैसे ही नवाब की बोगी रामपुर स्थित रेलवे स्टेशन पर पहुंची तो वहां लोगों का हज्जुम लग गया। कहा जाता है की हज्जुम को देखने के बाद नवाब ने फैसला लिया कि अस्थियां बाद में दफन की जाएंगी, उससे पहले इन्हें सभी लोगों को दर्शन कराए जाएं। इसी लिहाज से शहर के एक मैदान में उनकी अस्थियों को रखा गया। जहां शहर के लोगों ने बापू की अस्थियों के अंतिम दर्शन किए। इसके बाद अस्थियों को दफन करने के लिए कुछ हाथी मंगाए गए। जिन पर कलश रखकर मातमी धुनों के साथ शहर में होते हुए नगर के बीचोबीच उनकी अस्थियों को दफन किया गया। जबकि कुछ अस्थियों को रामपुर की कोसी नदी में विसर्जित किया गया।
जिस जगह पर बापू की अस्थियां दफन हैं उसका नाम नवाब गेट रखा गया है। तकरीबन 2000 वर्ग मीटर में फैली बापू की समाधी राजघाट से कम नहीं लगती। सुरक्षा के लिहाज से यहां 24 घंटे सुरक्षाबल भी तैनात रहता है। रात को दूधिया लाइटों की रोशनी में यह स्थल इतना अच्छा दिखाई पड़ता है कि शहर के ज्यादातर लोग यहां आकर बैठ जातें हैं। अब इसे पर्यटक स्थल के रूप में तबदील किए गया है। लोगों के घूमने और बैठने का यहां इतंजाम किया गया है। सीमेंट की बड़ी बड़ी बेंच भी यहां लगाई गई है। नगर पालिका द्वारा इसकी देखरेक की जाती है।