
जय प्रकाश
मुरादाबाद: शहर के गोविंदनगर इलाके के लोग शहर से एकतरफा कटी जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। और जब भी इसे पार करने की कोशिश करते हैं तो अक्सर जान गंवा बैठते हैं। यहां रेलवे क्रासिंग और अंडर पास या पुल न होने के चलते इलाके के लोग जान हथेली पर रखकर रेलवे ट्रैक पार करते हैं। जिस कारण कभी कभार लोग हादसों का शिकार बन जाते हैं। ये आंकड़ा अब तक डेढ़ सौ पार कर चुका है। ऐसा नहीं है इलाके के लोगों ने यहां के लिए मांग नहीं की,लेकिन अभी तक उन्हें सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला है।
बीते तीस सालों में रेलवे क्रॉसिंग की मांग कर रहे गोविंदनगर के पचास हजार से ज्यादा लोगो को क्रॉसिंग तो नहीं मिली। लेकिन बदले में मौत जरूर मिल रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिए रेलवे क्रॉसिंग एक चुनावी मुद्दा है वही सोये हुए सिस्टम ओर आंखों पर पट्टी बांध चुके अधिकारियों के लिए यह मुद्दा फाइलों तक सिमटा है।
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गोविंदनगर में रहने वाले बीस साल के विजयपाल जब अपने हाथ मे अपने दिवंगत पिता की तस्वीर लेकर बात करते है, तो उनकी आंखों की नमी उनका दर्द बयां कर जाती है। आठ साल पहले फैक्ट्री से घर लौटते समय विजयपाल के पिता पृथ्वीपाल रेलवे ट्रैक पार करते समय ट्रैन की चपेट में आ गए थे। ट्रैन से टकराने के बाद पृथ्वीपाल के दोनों पैर कट गए और एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद उनकी मौत हो गयी। परिवार ने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला लेकिन जो दर्द आठ साल पहले मिला उसके जख्म आज तक नहीं भर पाए। विजयपाल अकेले नहीं है। जिन्होंने रेलवे क्रॉसिंग पर अपने पिता को खोया है। इस इलाके में डेढ़ सौ से ज्यादा परिवार है जिनके अपनो की मौत रेलवे पटरियों पर हुई है।
शहर का यह हिस्सा दिल्ली-लखनऊ रेल मार्ग के चलते पटरियों के पार बसता है। शुरू से ही यहां पर रेलवे द्वारा क्रॉसिंग नहीं बनाई गई जिसके चलते लोगो को कई किलोमीटर दूर का चक्कर लगाकर शहर में आना पड़ता है। शुरू में लोग समय बचाने के लिए रेलवे ट्रैक को पार करने लगे जिसके चलते कुछ हादसे हुए। हादसों में लोगो की जान जाने का सिलसिला बढ़ा तो 1988 में स्थानीय लोगो ने रेलवे क्रॉसिंग की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। तब से आज तक तीस साल बीत गए और बीतते सालों के साथ क्षेत्र की आबादी भी बढ़ती गयी। आंदोलन के शुरुआती दौर से जुड़े और पार्षद रह चुके गगन शर्मा बताते है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ओर वोट बैंक की राजनीति ने कभी भी क्रॉसिंग के लिए गम्भीर प्रयास नहीं होने दिए। गगन शर्मा के मुताबिक पहले तो रेलवे इस क्रॉसिंग को अवैध मानता था लेकिन पूर्व में तैनात डीआरम द्वारा क्रॉसिंग की इजाजत दी गयी लेकिन क्रॉसिंग आज तक नहीं बन पाई।
यहां बता दें कि रेलवे क्रॉसिंग का यह मामला रेलवे विभाग और नगर निगम के बीच प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है। रेलवे क्रॉसिंग बनाने के लिए पहले नगर निगम से जमीन और निर्माण के पैसों की मांग करता रहा। पहले नगर निगम ने रुचि नहीं दिखाई फिर स्थानीय लोगो के दबाब, लगातार होते आंदोलनों और आये दिन के हादसों के बाद नगर निगम ने रेलवे की मांग दबाव में मान ली। नगर निगम ने रेलवे को जमीन और निर्माण के लिए आवश्यक धनराशि जारी करने का आश्वासन तो दिया। लेकिन ऐन मौके पर रेलवे द्वारा बनाये रेल ओवर ब्रिज के नक्शे पर आपत्ति लगाकर मामले को लटका दिया। रेलवे केवल पैदल चलने वाले लोगो के लिए ओवर ब्रिज बनाने पर तैयार है। जबकि नगर निगम की मांग है कि दोपहिया वाहनों के लिए भी ओवरब्रिज बनाया जाय।
महापौर विनोद अग्रवाल के मुताबिक रेलवे शुरू से ही मामले को लटकाने पर आमादा है। विनोद अग्रवाल का कहना है कि जब पैसे नगर निगम दे रहा है तो रेलवे नगर निगम की शर्तों के मुताबिक काम करे।
इस मामले में इलाके के सांसद सर्वेश सिंह भी बजट पास कराकर रेल मंत्रालय से दे चुके हैं। बस देरी है तो स्थानीय अधिकारीयों और रेल प्रशासन के बीच तालमेल में,वरना शहर की इतनी बड़ी आबादी अभी मौत के रास्ते से नहीं गुजर रही होती।