मुरैना जिले के आदिवासी बाहुल्य गांवों में शासन की योजनाएं कागजों में, आदिवासियों को नहीं मिल रहा लाभ, एनजीओ भी नहीं दिला पाए अधिकार
मुरैना. जिले के 45 गांवों के 20 हजार आदिवासियों के विकास को लेकर शासन व प्रशासन लगातार दावे करता रहा है लेकिन उनकी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। आदिवासियों के लिए चलाई जा रही योजनाएं कागजों तक सिमट कर रह गई हैं, इसी का परिणाम हैं कि आदिवासियों को परिवार में कोई बीमार है उसके इलाज के लिए या फिर शादी के लिए अपनी जमीन व राशन कार्ड तक गिरवी रखना पड़ रहे हैं। आदिवासियों का कहना हैं कि जब साहूकार के पैसे चुकता कर देते हैं, तब वापस कर दी जाती है, लेकिन तब राशन व जमीन का उपयोग वही लोग करते हैं।
पहाडगढ़़ के कोर्ट मौहल्ला के 60 परिवार जो खड़रिया पुरा से आकर बसे हैं। उन आदिवासी परिवारों से पत्रिका प्रतिनिधि ने बातचीत की तो उन्होंने अपना दुखड़ा रोया। उनका कहना हैं कि वर्तमान में अंचल में कोई मजदूरी नहीं मिल रही इसलिए अपने अपने घरों पर बैठे हैं। बीमार व्यक्ति का इलाज या शादी बगैरह होता है तो साहूकारों से इसी शर्त पर पैसा मिलता है, जब तक पैसा वापस नहीं करोगे, तब तक आपकी जमीन व कार्ड पर मिलने वाले राशन का उपयोग वही करेंगे। इन दिनों पंचायतों में ज्यादातर काम मशीनों से हो रहा है इसलिए उनको रोजगार नहीं मिल पा रहा है इसलएि गांव से बाहर निकलकर मजदूरी करते हैं, जो पैसा कमाकर लाते हैं, उससे अपना राशन कार्ड व जमीन वापस लेते हैं, साहूकार बिना व्याज के वापस कर देते हैं। विडंबना यह है कि आदिवासियों के विकास को लेकर शासन व प्रशासन तमाम शिविर लगाता है और उनकी मदद का ढिढोरा पीटता है लेकिन उनही हालत में कोई सुधार नहीं हैं। कुछ एनजीओ भी आदिवासियों के नाम पर शासन से फंड कबाड़ते हैं लेकिन विकास कागजों में पूरा कर दिया जाता है। उनकी हालत आज भी माली है।
इन गांवों में भी आदिवासी परिवार परेशान
जिले के धोबिनी, बहेरी, सायपुरा, गुलालई, बालौज, गोल्हारी, कन्हार, मरा, मानपुर, बहराई, बघेबर, खड़रिय पुरा, धौंधा, चेंटी खेड़ा, तालपुरा के आदिवासी परिवार भी रोजगार के लिए परेशान हैं। इन गांवों में एकता परिषद ने कुछ लोगों की जमीन वापस कराई लेकिन अभी भी कई लोगों की जमीन गिरवी रखी हुई है।
दिखावा साबित हुआ प्रशासन चला गांव की ओर अभियान
शासन के निर्देश पर हर साल तमाम अभियान चलाए जाते हैं। लेकिन ये अभियान सार्थक साबित नहीं हो रहे हैं। कुछ समय पूर्व प्रशासन चला गांव की ओर अभियान भी बड़े जोर शोर से चला और उसका प्रचार प्रसार भी करवाया गया लेकिन आदिवासी बाहुल्य गांवों में यह अभियान कागजों में सिमट कर रह गया। इसके अलावा जिले के प्रशासनिक अधिकारी आदिवासी गांव में पहुंचकर विकास के बड़े बड़े खाका खींचकर रिपोर्ट सरकार को भेजते रहते हैं, जबकि आदिवासी को अंचल में न पर्याप्त रोजगार मिल रहा है और उनके लिए चलाई जा रही योजनाओं का प्रोपर लाभ मिल रहा है। उनकी योजनाओं पर दबंग मजे कर रहे हैं। आदिवासी बाहुल्य गांव मरा में तत्कालीन कलेक्टर पूरे अमले के साथ गए और वहां शिविर लगाया और समस्याएं सुनीं लेकिन निराकरण कागजों में कर दिया, धरातल पर आज भी आदिवासी सुविधाओं से महरूम हैं।
पति बीमार हुए तो राशन कार्ड गिरबी रखना पड़ा, तब इलाज हो सका। बाद में मजदूरी करके पैसे कमाए और राशन कार्ड को उठाया लिया। ऐसा हम लोगों में होता रहता है।
जब परिवार में कोई बीमार हो, शादी या अन्य कार्यक्रम होता है, तब पैसे की आवश्यकता तो पड़ती है। ऐसी स्थिति में अपना राशन कार्ड अथवा जमीन को गिरबी रखकर पैसा लेना पड़ता है।
हम लोगों की जमीन की कोई कीमत नहीं हैं, जब पैसे की आवश्यकता होती है, अन्य लोगों की जमीन के डेढ़ दो लाख मिल जाते हैं लेकिन हमारी जमीन के 25 से 50 हजार की मिलते हैं।
कैलाश आदिवासी
जिले के 45 आदिवासी गांव में हजारों परिवार हैं जिनकी जमीन पैसों की खातिर गिरबी रखी हैं। हमने पूर्व में अभियान चलाया था, तब दस प्रतिशत लोगों की जमीन वापस करवाई थी लेकिन उनके पास कोई रोजगार नहीं हैं, तो मजबूरी में जमीन व राशन कार्ड गिरबी रख रहे हैं।
अधिकारियों की टीम भेजकर जांच कराएंगे, अगर राशन कार्ड व जमीन गिरवी रखने का मामला सामने आता है, उन आदिवासी परिवारों की मदद की जाएगी।