Bombay High Court: रेलवे हादसे में घायल एक व्यक्ति मुआवज़े की मांग लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा था, लेकिन अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, “पहले आप शराब पीते हैं, फिर शराब आपको पीने लगती है।
Bombay High Court: रेलवे हादसे में घायल एक व्यक्ति मुआवज़े के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचा था, लेकिन कोर्ट ने उसकी मुआवजे से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, “पहले आप शराब पीते हैं, फिर शराब आपको पीने लगती है।” कोर्ट ने मुआवजा न देने के पीछे कारण बताया कि ट्रेन से संबंधित यह घटना उस समय हुई, जब याचिकाकर्ता नशे की हालत में था।
मिली जानकारी के अनुसार, यह घटना साल 2001 की है। आवेदक का दावा है कि 10 मार्च की आधी रात को वह मरीन लाइंस स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी एक आती हुई ट्रेन की चपेट में आ गया। घटना के बाद उसे जीटी अस्पताल ले जाया गया, फिर उसके बाद बेहतर इलाज के लिए बांबे अस्पताल में भर्ती कराया गया। मेडिकल जांच में पता चला कि शख्स नशे की हालत में था; उसने भारी मात्रा में शराब का सेवन किया था।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले को ‘अनटुवर्ड इंसीडेंट’ यानी बदकिस्मती से हुई घटना नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को मुआवजा इसलिए नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसे लगी चोटें उसकी अपनी लापरवाही और नशे की हालत में किए गए कृत्य का परिणाम थीं। फैसले के दौरान कोर्ट ने अमेरिकी उपन्यासकार एफ. स्कॉट फिट्ज़गेराल्ड के प्रसिद्ध कथन का हवाला देते हुए कहा, “पहले आप शराब पीते हैं, फिर शराब आपको पीने लगती है और अंत में वह आपको पूरी तरह अपने कब्जे में ले लेती है।”
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शराब का सेवन व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा नकारात्मक असर डालता है तथा यह पारिवारिक रिश्तों, पेशेवर करियर और सामाजिक जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। जस्टिस जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने बुधवार को दिए गए फैसले में वर्ष 2014 के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने संबंधित मामले में मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में स्वयं की लापरवाही के लिए राहत नहीं दी जा सकती।