
Mumbai ITAT TDS Property Purchase Ruling: अगर आप कोई घर या प्रॉपर्टी खरीदने जा रहे हैं, तो टैक्स डिडक्शन एट सोर्स (TDS) से जुड़े नियमों को बारीकी से समझना बेहद जरूरी है। ऐसा न करने पर आप अनजाने में आयकर विभाग के भारी-भरकम टैक्स नोटिस के जाल में फंस सकते हैं। हाल ही में इनकम टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (ITAT) की मुंबई पीठ ने एक ऐसे ही मामले में फैसला सुनाते हुए मकान खरीदारों को बड़ी राहत दी है और टीडीएस दायित्वों की सही समझ पर जोर दिया है।
आपको बता दें कि यह मामला मुंबई की एक महिला निवासी से जुड़ा है, जिन्होंने अपने पति के साथ मिलकर हाजी अली इलाके में 1.9 करोड़ का एक फ्लैट संयुक्त रूप से (Jointly) खरीदा था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रॉपर्टी में महिला की हिस्सेदारी 15% (यानी 28.5 लाख) थी। उन्होंने अपने हिस्से की खरीद कीमत पर धारा 194-IA के तहत 1% की दर से 28,500 रुपए का टीडीएस (TDS) काटा और जमा कर दिया। बाद में आयकर विभाग ने महिला को ₹5.8 लाख से अधिक का टैक्स डिमांड नोटिस भेज दिया। विभाग का तर्क था कि संपत्ति बेचने वाले (विक्रेता) का पैन (PAN) 'इनऑपरेटिव' (निष्क्रिय) था, इसलिए धारा 206AA के तहत उच्च दर से टीडीएस काटा जाना चाहिए था।
इस मामले की सुनवाई करते हुए मुंबई ITAT ने आयकर विभाग की 5.8 लाख रुपए की मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में मुख्य रूप से दो बातें कहीं। सबसे पहली बात ये थी कि विक्रेता ने केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा जुलाई 2025 में जारी एक सर्कुलर में निर्धारित समय सीमा के भीतर अपने पैन को आधार से लिंक करके उसे रेगुलराइज (सक्रिय) कर लिया था। वहीं, दूसरी टिप्पणी थी कि विक्रेता ने पहले ही अपने टैक्स रिटर्न में इस संपत्ति से हुए कैपिटल गेन्स (पूंजीगत लाभ) का खुलासा कर दिया था और उस पर लागू टैक्स का भुगतान भी कर दिया था। ऐसे में खरीदार को 'डिफॉल्ट करने वाला करदाता' मानना बिल्कुल गलत है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि पैन और आधार का लिंक न होना तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे कई मामले हैं जहां टीडीएस की कम कटौती के कारण खरीदारों को टैक्स डिमांड का खामियाजा भुगतना पड़ता है। चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) केतन वजानी और एमीत पटेल ने खरीदारों को निम्नलिखित बातों का ध्यान रखने की सलाह दी है।
निवासी विक्रेताओं (Resident Sellers) के मामले में धारा 194-IA के तहत आम तौर पर 1% टीडीएस काटा जाता है। खरीदारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि टीडीएस की गणना ट्रांजैक्शन वैल्यू (सौदे की कीमत) या स्टैम्प ड्यूटी वैल्यू (सर्किल रेट), दोनों में से जो भी अधिक हो, उस पर की जाए।
टीडीएस केवल प्रॉपर्टी की कीमत पर नहीं, बल्कि कुल राशि पर कटना चाहिए, जिसमें पार्किंग शुल्क, क्लब मेंबरशिप और बिजली बोर्ड शुल्क जैसे अतिरिक्त चार्ज भी शामिल हों।
विक्रेता होने पर बड़ा जोखिम: यदि आप किसी एनआरआई (NRI) से प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं, तो अनुपालन का बोझ बहुत बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में मानक 1% के बजाय धारा 195 के तहत लागू दरों पर विक्रेता के कर योग्य कैपिटल गेन्स की गणना करके टीडीएस काटना होता है।
कई बार पति पूरे पैसे देता है लेकिन सुरक्षा के लिए पत्नी का नाम जोड़ देता है। ऐसे मामलों में खरीदार के लिए यह तय करना चुनौतीपूर्ण होता है कि बिक्री मूल्य और टीडीएस घटकों का सही आवंटन दोनों के बीच कैसे किया जाए।