निर्देशक: अनुभव सिन्हा सितारे: तापसी पन्नू, पवैल गुलाटी, कुमुद मिश्रा, दिया मिर्ज़ा, माया सराव, मानव कौल, तन्वी आज़मी, राम कपूर, रत्ना पाठक शाह और अन्य लेखक: अनुभव सिन्हा और मृणमयी लागू सिनेमैटोग्राफ़ी: सौमिक मुखर्जी एडिटर: यशा राम चंदानी रन टाइम: 142 मिनटरेटिंग: 4/5 स्टार
अरुण लाल
मुंबई. भारतीय समाज में स्त्री की दशा जैसे लोकप्रिय विषय के चलते यह फिल्म चर्चा का विषय बनने जा रही है। जहां एक थप्पड़ के चलते एक युवती अपने पति से तलाक की दिशा में बढ़ती है। उसका फैसला तब भी नहीं बदलता, जब उसे पता चलता है कि वह मां बनने वाली है।
अपर मिडिल क्लॉस की कहानी कहती यह फिल्म अपने अच्छे संदेश, बेहतरीन डायरेक्शन और बेहतर संवादों के चलते हर किसी को अच्छी लगेगी, पर इसे हजम करना कठिन होगा। कहानी पर बहुत मेहनत की गई है। कहीं कहानी में कोई झोल नहीं है। फिल्म में कई स्त्रियों की कहानियों के माध्यम से पुरुष वर्चस्व की मानसिकता पर करारा प्रहार किया गया है। फिल्म की कमी ढूंढ़ें तो यह नजर आएगा कि फिल्म में सब कुछ सफेद या काला दिखाया गया है, जबकि वास्तविक जीवन जटिलता से भरा है। कह सकते हैं कि स्त्री पुरुष संबंधों पर बन बनी यह फिल्म एक आदर्श प्रस्तुत करती है, ऐसा होना चाहिए।
कहानी
कहानी अमृता (तापसी पन्नू) और उसके पति विक्रम (पवेल गुलाटी) की है। अपने पति से बेहद प्यार करने वाली अमृता पति के प्रमोशन के साथ लंदन जाने को लेकर बेहद उत्साहित है। अमृता का जीवन पूरी तरह से विक्रम के प्रति समर्पित है। पति का प्रमोशन होता है और घर में पार्टी होती है। तभी फोन आता है और विक्रम को बताया जाता है कि उसे लंदन में पहली की बजाए दूसरी पोजिशन में कार्य करना होगा।
इस बात से गुस्साया विक्रम पार्टी में मौजूद अपने बॉस से झगड़ने लगता है, अमृता उसे वहां से हटने को कहती है, और विक्रम उसे थप्पड़ मार देता है। इसके बाद पहले तो अमृता खुद से लड़ती दिखती है, उसके बाद वह विक्रम से लड़ती है। अमृता की कहानी के साथ ही उसकी मां (रत्ना पाठक), उसकी वकील (माया सराओ), उसकी सास (तन्वी आजमी), उसके पड़ोसी (दिया मिर्जा) उसके भाई की प्रेमिका और उसकी नौकरानी की कहानी चलती है। ये सभी कहीं न कहीं स्त्री होने का कर्ज चुका रही होती हैं। पूरी कहानी जानने के लिए फिल्म देखनी होगी।
डायलॉग पंच
"बस एक थप्पड़ ही तो था। क्या करूं? हो गया ना।" और "कई बार सही करने का रिजल्ट हैप्पी नहीं होता।" जैसे बेहतरीन डायलॉगों से भरी है यह फिल्म, दर्शकों के मन में उठने वाले हर सवाल का जवाब फिल्म में डायलॉगों के माध्यम से दिया गया है।
डायरेक्शन
सधा हुआ डायरेक्शन और सलीके से लिखी गई कहानी इस फिल्म को बेहतरीन बना देती है। फिल्म की खूबसूरती यह है कि डायरेक्टर अनुभव कहीं भी अपने विषय से भटके नहीं हैं। हर फ्रेम में उन्होंने जो दिखाया, उसे जस्टीफाई भी कर दिया। शुरुआती 15 से 20 मिनट ऐसा लगता है कि फिल्म बिखर रही है, पर इसके बाद फिल्म पर ऐसी पकड़ बनती है कि दर्शक देखता रह जाता है। बेहतरीन डायरेक्शन दर्शकों को अपने साथ विचारों का झूला झुलाती है। कभी उसे लगता है, यह सही है और कभी लगता है गलत है। डायरेक्शन में कहीं कोई झोल नहीं, दर्शकों को बांधे रखने में सफलता के साथ, सब परफेक्ट है।
एक्टिंग
सभी अदाकारों ने अपने-अपने हिस्से का बेहतरीन कार्य किया है। तापसी और पवेल गुलाटी ने अपने किरदार में जान डाल दी है। वकील की भूमिका में माया सराओ ने बहुत अच्छा काम किया है। पिता के रूप में कुमुद मिश्रा भी बेहद प्रभावित करते हैं। इसके बाद रत्ना पाठक, तन्वी आजमी, दिया मिर्जा और फिल्म में मौजूद हर कलाकार ने अपना काम बखूबी किया है।
क्यों देखें
भारतीय समाज और महिलाओं की दशा का वर्णन करती हुई यह फिल्म हर किसी को देखनी चाहिए। यह एक आदर्श प्रस्तुत करती है, कि पति पत्नी का संबंध कैसा हो।