
मेड़ता सिटी.नागौर. मेड़ता के अनुसूचित जाति-जनजाति विशिष्ट न्यायालय के न्यायाधीश आशीष बिजारनियां ने हत्या के आरोपियों को बरी करने के एक फैसले में कहा कि यद्यपि अभियुक्त दोषमुक्त हो रहे है, तथापि यह तथ्य निर्विवाद रूप से सिद़्ध है कि 14 मई 2015 की घटना में पांच व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। अनेक व्यक्ति गंभीर रूप से आहत हुए। दोषमुक्ति का यह अर्थ नहीं कि अपराध घटित ही नहीं हुआ। इसका अर्थ मात्र यह है कि उसे कारित करने वाले व्यक्ति विधिसम्मत साक्ष्य द्वारा अभिनिश्चित नहीं हो सके।
नागौर जिले के डांगावास कस्बे में पांच दलितों सहित 6 लोगों की हत्या के 11 साल 2 महीने और 22 दिन बाद कोर्ट का फैसला सामने आया। मेड़ता के अनुसूचित जाति-जनजाति विशिष्ट न्यायालय ने बुधवार को इस मामले के सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हत्या का अपराध हुआ है। परन्तु विधिसम्मत साक्ष्य अभिनिश्चित नहीं हो पाए। इस मामले की जांच सीबीआइ ने कर 40 आरोेपियों को जेल भिजवाया था। न्यायाधीश आशीष बिजराणियां ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट में फैसला सुनाए जाने दौरान दोनों पक्ष के काफी संख्या में ग्रामीण बाहर मौजूद रहे। इस दौरान अहतियातन पुलिस जाब्ता तैनात रहा। दूसरी ओर पीड़ित पक्ष ने हाइकोर्ट में पिटीशन लगाने की बात कहीं है।
न्यायाधीश आशीष बिजारनियां ने फैसले में कहा कि ऐसी िस्थति में पीडि़तगण एवं मृतकगण के आश्रितगण, धारा 357-क दंड प्रक्रिया संहिता अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम 1955 के नियम 12 (4) एवं अनुसूची तथा राजस्थान पीडि़त प्रतिकार स्कीम के उपबंधों के अंतर्गत राजस्थान पीडि़त प्रतिकर स्कीम के अधीन समुचित प्रतिकर अवधारित किए जाने के लिए प्रकरण संस्तुति सहित जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्दिष्ट किया जाता है।
गत 14 मई 2015 को जमीन के मालिकाना हक को लेकर हुए खूनी संघर्ष में ट्रैक्टर से कुचलकर एक गुट के 5 जनों और एक अन्य युवक की मारपीट कर हत्या कर दी गई थी। हत्याकांड के बाद वर्ष 2015 में पुलिस ने मुख्य आरोपियों सहित कुछ लोगों को गिरफ्तार किया। इन्हें न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया। बाद में राजस्थान सरकार ने इस प्रकरण को सीआईडी को सौंप दिया।
पीड़ित परिवार की मांग पर जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई। करीब 2 साल तक मामले की तफ्तीश करने के दौरान सीबीआई ने चार्जशीट पेश करने के साथ ही फरार अन्य आरोपियों की धरपकड़ की। 2019 में राजस्थान हाइकोर्ट ने मामले में कड़ा रुख अपनाया और फरार आरोपियों को पकड़ने के लिए ट्रायल को तीन महीने रोकने और सीबीआई को सख्त आदेश दिए। इसके बाद पुलिस की विशेष टीमों ने दबिश देकर 40 आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भिजवाया था।
अभियुक्त पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कमल कुमार आचार्य, एडवोकेट महिपाल लटियाल, एडवोकेट महेंद्र चौधरी व एडवोकेट बाबूलाल गोरा ने पैरवी की, वहीं परिवादी की ओर से सीबीआई, दिल्ली के लोक अभियोजक ने पैरवी की ।
इस मामले में अभियुक्त पक्ष के अधिवक्ता महेंद्र चौधरी ने बताया कि सीबीआइ ने इस जांच में कई त्रुटियां की है। परिवादी पक्ष ने मुकदमा दायर कर बताया कि हमारी जमीन पर इस प्रकार की घटना हुई है, वो बिलकुल गलत है। यह जमीन उनकी नहीं थी । उन्होंने रजिस्टर्ड बेचाननामे के लिए घीसाराम नाम के व्यक्ति को जमीन बेची। घीसाराम से जिमनाराम ने यह जमीन रजिस्टर्ड बेचाननामें से ली। गलती सिर्फ इतनी हुई कि उसके नाम से म्यूटेशन दर्ज नहीं हुआ। इस वजह से इन लोगों ने जमीन पर कब्जा करने के लिए समूह बनाया। कुछ लोगों ने इनसे समझाइश के लिए प्रयास किया तब मारपीट के दौरान यह हत्याएं हुई। जिन 40 लोगों को आरोपी बनाया गया, वे घटना में शामिल नहीं थे।
डांगावास में जिस जमीन को लेकर हत्याकांड हुआ था, वो 3.77 हेक्टेयर जमीन है। यह जमीन विवाद करीब 40-50 साल पुराना था। 14 मई 2015 को दोबारा पंचायत के बाद बड़ी संख्या में लोग ट्रैक्टर, पिकअप और मोटरसाइकिलों से विवादित जमीन पर पहुंचे। उस समय रतनाराम, पांचाराम, मुन्नाराम, अर्जुनराम, खेमराम, गणेशराम, किशनराम, पाप्पुड़ी देवी, बिदामी देवी, शोभा देवी, भंवरी देवी, सोनकी देवी सहित परिवार के कई सदस्य वहां मौजूद थे। आरोप था कि भीड़ ने मकान और झोपड़ी तक पहुंचकर हमला किया। ट्रैक्टर से निर्माण गिरा दिया गया और लोगों के साथ लाठी-सरिया से मारपीट की गई। हमले में रतनाराम मेघवाल, पोकरराम मेघवाल, पांचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल, गणपतराम मेघवाल एवं एक अन्य रामपाल गोसाईं की मौत हो गई थी।
इस मामले में मृतक के रिश्तेदार गोविंदराम मेघवाल ने कहा कि कोर्ट का फैसला सर्वमान्य है, लेकिन कोर्ट को आधी-अधूरी जानकारी मिली है। हमारा सवाल रहेगा कि कोर्ट ने अगर 40 आरोपियों को बरी किया, तो पांच लोगों की हत्या किसने की।
मेड़ता सिटी. न्यायालय के आदेश के अनुसार अभियुक्तों पर धारा 147, 148, 447, 323, 324, 325, 326, 427, 436, 454, 307 और 302 के साथ सहपठित धारा 149 भारतीय दंड संहिता तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अधिनियम 1989 की धारा 3(i)(v), 3(i)(x), 3(ii), 3(v) एवं 3(i)(x1) के तहत आरोप थे। न्यायालय ने इन आरोपों में संदेह का लाभ देते सभी 40 अभियुक्तों को दोषमुक्त किया। न्यायालय ने अपील अवधि तक धारा 437-ए सीआरपीसी के प्रावधानों की पालना के लिए प्रत्येक अभियुक्त से 50 हजार रुपए का व्यक्तिगत बंधपत्र और 50 हजार रुपए का प्रतिभूति पत्र लेने के आदेश दिए हैं।
न्यायालय ने इस प्रकरण मामले से जुड़े आर्टिकल संख्या 1 से 75 तक सभी सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश दि हैं। विवादित जमीन के खातेदारी संबंधी अधिकारों को लेकर न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबंधित पक्षकारों के सिविल एवं राजस्व अधिकार सक्षम न्यायालय में पूरी तरह खुले और अप्रभावित रहेंगे। इसके साथ ही पीड़ित पक्ष एवं मृतकों के आश्रितों को धारा 357-ए के तहत राजस्थान पीड़ित प्रतिकर योजना के अनुसार उचित मुआवजा निर्धारित करने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवश्यक कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।