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नागौर में 7 महीने से नहीं मिली मिड-डे मील की राशि, बच्चों को भोजन कराना स्कूलों के लिए बना चुनौती

मिड डे मील का खाना बनाने वाली कुक कम हैल्पर का मानदेय भी छह महीने से नहीं दिया, कुकिंग कन्वर्जन राशि पिछले सात महीने से बाकी तो दूध का भुगतान 10 महीने से नहीं किया
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सरकारी स्कूल में दोपहर का भोजन करते बच्चे

सरकारी स्कूल में दोपहर का भोजन करते बच्चे

नागौर. सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले लाखों बच्चों को दोपहर का पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने वाली मिड-डे मील योजना वित्तीय संकट से जूझ रही है। जिले के विद्यालयों को पिछले सात महीने से कुकिंग कन्वर्जन राशि नहीं मिली है, जबकि भोजन तैयार करने वाली कुक कम हेल्पर का मानदेय भी छह महीने से लंबित है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री बाल गोपाल दूध योजना के तहत दूध तैयार करने के लिए मिलने वाली राशि का भुगतान भी पिछले आठ महीने से नहीं हुआ है। ऐसे में संस्था प्रधानों के सामने बच्चों को नियमित और गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बन गया है।

शिक्षा विभाग के अनुसार जनवरी 2026 से जुलाई 2026 तक मिड-डे मील योजना की कुकिंग कन्वर्जन राशि, जिससे मसाले, सब्जियां, गेहूं पिसाई, ईंधन आदि की व्यवस्था होती है, इसके साथ खाना व दूध तैयार करने वाली कुक कम हेल्पर के मानदेय का भुगतान भी नहीं हो पाया है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री बाल गोपाल दूध योजना के तहत दूध तैयार करने के लिए चीनी, ईंधन और व्यवस्थापक के मानदेय की राशि भी जनवरी से अटकी हुई है। भुगतान नहीं होने से कई विद्यालयों में संस्था प्रधानों को स्थानीय स्तर पर उधार लेकर या अन्य संसाधनों से व्यवस्था करनी पड़ रही है।

गौरतलब है कि मिड-डे मील योजना के तहत कक्षा 1 से 5 तक के प्रत्येक विद्यार्थी पर 6.78 रुपए तथा कक्षा 6 से 8 तक के प्रत्येक विद्यार्थी पर 10.17 रुपए की कुकिंग कन्वर्जन राशि निर्धारित है। इसी राशि से ईंधन, मसाले, सब्जियां, खाद्य तेल, अनाज की पिसाई तथा प्रत्येक गुरुवार को बच्चों को फल उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी होती है। लगातार भुगतान नहीं होने से इन सभी व्यवस्थाओं पर असर पड़ रहा है।

मामूली मानदेय, वो भी छह महीने से नहीं दिया

योजना में भोजन बनाने वाली कुक कम हेल्पर को 2297 रुपए प्रतिमाह मानदेय दिया जाता है, लेकिन छह महीने से भुगतान नहीं मिलने के कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं बाल गोपाल दूध योजना में दूध तैयार करने के लिए 500 रुपए प्रतिमाह व्यवस्थापक मानदेय भी लंबे समय से बकाया है। इससे योजना के संचालन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

संस्था प्रधान बोले - अब तो उधार देना भी बंद कर दिया

विद्यालयों के संस्था प्रधानों का कहना है कि सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं का लाभ बच्चों तक तभी प्रभावी ढंग से पहुंच सकता है, जब समय पर बजट उपलब्ध कराया जाए। लंबे समय तक भुगतान अटकने से स्कूलों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है और स्थानीय स्तर पर उधार लेकर व्यवस्था करना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। दुकानदारों ने उधार देना भी बंद कर दिया है।

टेक्नीकल इश्यू के कारण बिल नहीं बन रहे

हां, यह सही है कि मिड-डे-मील योजना का पिछले करीब छह महीने का भुगतान बाकी है। दरअसल, हाल ही एसएनए ने स्पर्श पोर्टल शुरू किया है, जिस पर बिल तैयार कर भेजे जाने हैं। नया पोर्टल होने के कारण बिल तैयार करने में तकनीकी समस्याएं आ रही हैं, जिससे भुगतान में देरी हो रही है। बजट उपलब्ध है और तकनीकी समस्या दूर होते ही लंबित भुगतान जारी कर दिए जाएंगे।

- बागाराम जांगू, एडीइओ, शिक्षा विभाग, नागौर