नागौर

प्लास की पकड़ से फिसल रही मोहलत, औजारों की खनक पर मार्का का साया

नागौर के ऐतिहासिक हैंड टूल्स (औजार) उद्योग पर बीआईएस द्वारा आइएसआइ मार्का अनिवार्य करने से संकट खड़ा हुआ है। हैंड टूल्स उद्योग में लगे 10-12 हजार कारीगरों की रोजी पर संकट खड़ा हो गया है।

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May 27, 2026
औजार मंडी नागौर: आइएसआइ नियमों से संकट में 100 साल पुराना उद्योग

दिनेश कुमार स्वामी@ नागौर. प्राचीन माही दरवाजे को पार कर लोहारपुरा की तंग गलियों में आगे बढ़ते ही हर दूसरे-तीसरे मकान या दुकान से लोहे की घिसाई की खनक सुनाई पड़ने लगती है। कटिंग लोहा कई मशीनों और हाथों से होकर भट्टियों पर तपकर यहां औजार का रूप लेता है। जो देश के हर कोने के साथ विदेश में अमेरिका और दुबई तक जाते है। कुटीर उद्योग के साथ मशीनी उपयोग के इस मिश्रित कार्य में लगे दस से बारह हजार कामगारों की रोजी-रोटी पर संकट के बादल मंडरा रहे है।

असल में हैंड टूल्स की बिना आइएसआइ मार्का बिक्री की मोहल्लत 30 सितम्बर को समाप्त हो रही है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे है, हैंड टूल्स के कारोबार से जुड़े लोगों में चिंता बढ़ती जा रही है। केन्द्र सरकार की ओर से करीब डेढ़ साल पहले प्लास/प्लायर सहित हैंड टूल्स पर आइएसआइ मार्का की अनिवार्यता लागू की गई। यहां के कामगारों ने आवाज उठाई तो पिछले साल अक्टूबर में एक साल की मोहलत मिल गई। यह मोहलत समाप्त होने के बाद जिस औजार पर आइएसआइ का मार्का नहीं लगा होगा, उसे बनाना और बेचना अवैध हो जाएगा। चालीस से पचास करोड़ रुपए सालाना टर्नओवर वाले हैंड टूल्स वाली नागौर की औजार मंडी को बेजार होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

संकट: 100 कारखानों और हजारों कामगारों पर

मुद्दे की गहराई में जाने के लिए लोहारपुरा की एक फैक्ट्री पर पहुंचे तो वहां मिले 71 वर्षीय शबीर हुसैन। जो हमें उस संकट को करीब से महसूस कराने कारखाने के भीतर ले गए। अंदर भट्टी की तपन के बीच महिलाएं और पुरुष कारीगर प्लास, प्लायर, नोज कटर, हथौड़ी जैसे औजारों को मशीनों पर आकर दे रहे थे। पसीने से लथपथ इनके हाथ चल रहे थे। एक-दो या पांच रुपए पीस की मजदूरी है, सौ दिनभर में ज्यादा से ज्यादा औजार बनाकर गुजारे के लिए मजदूरी पाते है। लोहे के घर्षण की चिंगारियां और तीखी आवाज के बीच बुजुर्ग काराखाना मालिक शबीर बोले, सरकार ने फैसला नहीं बदला, तो यह सब कुछ दिन बाद बंद हो जाएगा। नागौर के लोहारपुरा और रीको में लगे हैंड टूल्स के 100 से ज्यादा उद्योग और दस-बारह हजार कारीगरों बेरोजगार हो जाएंगे।

वजह: बिना मार्का के औजारों पर प्रतिबंध

नागौर के ऐतिहासिक हैंड टूल्स (औजार) उद्योग पर बीआईएस द्वारा आइएसआइ मार्का अनिवार्य करने से संकट खड़ा हुआ है। इससे छोटे कारीगरों का अस्तित्व खतरे में है। अक्टूबर 2025 में केंद्र सरकार ने इस नए आदेश से एक साल के लिए राहत दी। जो सितम्बर 2026 में समाप्त हो जाएगी।

दिक्कत: मापदंड पूरे करना चुनौती

आइएसआइ मार्का के लिए तय वैज्ञानिक मापदंड को पूरा करना और इसकी पैचीदा प्रक्रिया को अपनाना यहां के छोटे कारखानों और पारंपरिक कारीगरों के बूते की बात नहीं है। जटिल व महंगी आइएसआइ प्रमाणन प्रक्रिया का ढांचा वे खड़ा नहीं कर सकते। ऐसे में केन्द्र सरकार इस कुटीर उद्योग की वास्तविकता को देखकर प्लायर व प्लास जैसे औजारों को मार्का की बाध्यता से बाहर करें।

- सनत जैन, हैंड-टूल कारोबारी नागौर

यह है सरकारी फरमान

भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने करीब डेढ़ साल पहले आदेश जारी किया कि प्लायर सहित हैण्ड टूल्स के 9 औजारों पर आइएसआइ मार्का लगा होना अनिवार्य होगा। इसके बिना इन औजारों को भारत में नहीं बेचा जा सकेगा।

डाटा फैक्ट: नागौर एक औजार मंडी

- 50 करोड़ रुपए हैण्डटूल्स का सालाना टर्न ओवर
- 100 के करीब नागौर शहर व रीको में इकाइयां
- 12 हजार कारीगर इस उद्योग से प्रत्यक्ष जुड़े
- 7 हजार टन लोहा के हर साल बन रहे औजार

दायरा: इन हैण्ड टूल्स का निर्माण

नागौर में मुख्य रूप से हस्त औजारों में प्लायर (सरौता), टोंग्स (संडासी), कटर, नोज प्लायर, बालपेन, फ्रास पेन, स्ट्रेट पेन, हैमर, कतिया, पिनन्सर कटर, कुल्हाड़ी, ब्लैक स्मिथ टूल्स, मैसन तथा स्टोन कटिंग टूल्स शामिल हैं। सुनारों के के सभी महीन औजार सिर्फ यहीं बनते है।

नाज: देश में सबसे पहले यहां बने

नागौर वर्ष 1911 से हैंड टूल्स निर्माण का प्रमुख केंद्र है। देश में सबसे पहले प्लायर, प्लास और सुनारों के महीन कटर व औजार नागौर में ही बनने शुरू हुए। जिसने नागौर को औजार मंडी की पहचान दी। साल 1970 में सरकारी मदद से यहां मशीनों का आगमन हुआ। आज अमेरिका, यूएई, अरब देशों, नेपाल और देश के सभी महानगरों से लेकर कस्बों और गांवों तक यहां बने औजार जा रहे हैं।

Updated on:
27 May 2026 12:44 pm
Published on:
27 May 2026 12:22 pm
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