- पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्य पिछले छह महीने से कर रहे हैं बैठकों का बहिष्कार- पंचायतीराज के सदस्यों का भत्ता गाड़ी के पेट्रोल बराबर भी नहीं- वार्ड पंच से लेकर जिला परिषद सदस्य तक को नहीं मिलता विकास कार्यों के लिए बजट- पंचायत समिति व जिला परिषद की बैठकों का हो रहा बहिष्कार, कई कार्यों का अनुमोदन अटका
नागौर. महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को पूरा करने के लिए नागौर जिले से शुरू की गई पंचायतीराज व्यवस्था 63 साल बाद भी कई कमियों से जूझ रही है। भले ही पंचायती राज व्यवस्था को ग्रामीण भारत की स्थानीय स्वशासन की प्रणाली का नाम दिया गया, लेकिन इसके प्रतिनिधि आज भी अपने आप को असहाय महसूस कर रहे हैं।
आज भी 'माननीय' यानी वार्ड पंचों, पंचायत समिति सदस्यों एवं जिला परिषद सदस्यों के साथ सरपंच को अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए पृथक से कोई बजट आवंटित करने का प्रावधान नहीं है, लेकिन इनके अनुमोदन से ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों रुपए का विकास कार्य करवाए जाते हैं। पंचायतीराज के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की यही सबसे बड़ी पीड़ा है कि उनके अनुमोदन से करोड़ों रुपाए के कार्य तो होते हैं, लेकिन उन्हें न तो पृथक से कोई बजट नहीं दिया जाता है और न ही वेतन-भत्ते। सरकार का कहना है कि वार्ड पंचों, पंचायत समिति सदस्यों एवं जिला परिषद सदस्यों एवं सरपंच को विकास कार्यों के लिए विशेष बजट देने के संबंध में वर्तमान में कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है। इसी पीड़ा को लेकर वार्ड पंच से लेकर पंचायत समिति सदस्य एवं जिला परिषद सदस्य, सरपंच आदि बैठकों का विरोध कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों का विकास अटका हुआ है।
वार्ड पंच को एक बैठक के मिलते हैं
राज्य सरकार की ओर से विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार वार्ड पंच, संरपच, पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्य को वेतन व भत्ता दिया जाता है। इसमें सरपंच को 4800 रुपए प्रति माह मानदेय दिया जाता है, जबकि जिला परिषद सदस्य को प्रति बैठक 600 रुपए भत्ता, पंचायत समिति सदस्य को प्रति बैठक 420 रुपए भत्ता तथा वार्ड पंच को प्रति बैठक 240 रुपए भत्ता दिया जाता है। खास बात यह है कि गांवों में ग्राम सभाएं न के बराबर होती है।
प्रधान और जिला प्रमुख चुनने के बाद महत्व नहीं
अपनी मांगों को लेकर बैठकों का बहिष्कार कर रहे पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्यों का कहना है कि राजस्थान पंचायती राज संस्थाओं का संस्थापक राज्य है। त्रिस्तरीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग वार्ड पंच, पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्य का निर्वाचन तो 5 वर्ष के लिए होता है, लेकिन उनका प्रधान व जिला प्रमुख के मतदान के बाद महत्व व औचित्य शून्य हो जाता है। पंचायतीराज के चुने हुए हजारों सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास एवं मतदाताओं को किसी भी प्रकार की सुविधाएं प्रदान करने का अधिकार भी नहीं है। वो मात्र साधारण सभा का कोरम पूरा करने के संसाधन मात्र हो गए हैं, जबकि पंचायत समिति सदस्य का निर्वाचन क्षेत्र सरपंच से बड़ा होता है। नागौर जिला परिषद सदस्य ओमप्रकाश सेन ने बताया कि जब तक उनकी मांगें नहीं मानी जाएंगी, तब तक बैठकों का बहिष्कार जारी रहेगा।
ये हैं प्रमुख मांगें
- सरपंच, प्रधान व जिला प्रमुख की भांति, पंचायत समिति सदस्यों को भी प्रशासनिक अधिकार दिए जाए।
- अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र व राज्यों से प्राप्त अनुदान राशि में से सदस्यों को दलगत राजनीति से ऊपर निर्धारित अनुपात में राशि उपलब्ध करवाई जाए।
- अपने वार्ड में पंचायत समिति मद से विकास कार्य स्वीकृत करवाने के लिए संबधित ग्राम पंचायत के सरपंच की जगह पंचायत समिति सदस्यों से प्रपत्र 5 लेने की स्वीकृति जारी की जाए।
- पार्षदों व पंचायत राज संस्थाओं के प्रधान, जिला प्रमुख व सरपंच की भांति पंचायत समिति सदस्यों को न्यूनतम 10 हजार रुपए मासिक मानदेय दिया जाए।
- सदस्य के वार्ड में होने वाले प्रत्येक विकास कार्यों के पूर्णतया, उपयोगिता प्रमाण पत्र, (यूसी, सीसी) पर पंचायत समिति सदस्य के हस्ताक्षर अनिवार्य किया जाए।
- निर्वाचन क्षेत्र में स्वीकृत विकास कार्यों में सदस्य की अनुशंसा अनिवार्य की जाए।
गांवों में विकास कार्य ठप
पंचायतीराज के जनप्रतिनिधियों की ओर से बैठकों का बहिष्कार करने से जिले के ग्रामीण क्षेत्र का विकास पूरी तरह ठप हो गया है। मनरेगा की कार्ययोजना का अनुमोदन नहीं होने से कार्य बंद पड़े हैं। पहले नागौर प्रदेश में दूसरे स्थान पर था, जो अब 20वें स्थान पर आ गया है। नौकरीशाही पूरी मनमर्जी कर रही है, नौकरशाह चाहते हैं कि वे जो करें, वही हो। जनप्रतिनिधियों की अनुशंसा को पूरी तरह दरकिनार किया जा रहा है। इसीलिए विरोध हो रहा है।
- भागीरथराम चौधरी, जिला प्रमुख, नागौर