
नागौर. बड़ली क्षेत्र में दो दिन पहले करीब 50 बीघा सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाकर प्रशासन ने सख्त कार्रवाई का संदेश दिया, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल शहर के उन 56 अतिक्रमणों को लेकर उठ रहा है, जो वर्षों पहले राजस्व रिकॉर्ड में प्रमाणित होने के बावजूद आज तक जस के तस बने हुए हैं। यदि प्रशासन सरकारी भूमि बचाने को लेकर गंभीर है तो फिर शहर के पारम्परिक जल स्रोतों की आड व अंगोर भूमि पर किए गए साबित अतिक्रमणों पर कार्रवाई कब होगी, का इंतजार शहर भी कर रहा है।
56 अतिक्रमणों की रिपोर्ट पर वर्षों से सन्नाटा
जनवरी 2020 में तत्कालीन तहसीलदार ने शहर के 12 पारम्परिक जल स्रोतों की जांच कर जड़ा तालाब, बख्तासागर, प्रताप सागर, दुलाया, लाल सागर, समस तालाब, गांछोलाई, मुंदोलाव नाडी, गिनाणी तालाब सहित अन्य जल स्रोतों की आड एवं अंगोर भूमि पर कुल 56 अतिक्रमण चिह्नित किए थे। जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन एसडीएम ने जिला कलक्टर को कार्रवाई के लिए पत्र भी भेजा, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका।
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15 दिन में रिपोर्ट मांगी, वर्षों बाद भी कार्रवाई नहीं
तत्कालीन जिला कलक्टर ने उपखंड अधिकारी की अध्यक्षता में नगर परिषद आयुक्त और तहसीलदार की तीन सदस्यीय समिति बनाकर 15 दिन में कार्रवाई रिपोर्ट देने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद वर्षों बीत जाने के बाद भी न तो अतिक्रमण हटे, और न ही दोषी अधिकारियों अथवा कब्जाधारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हुई। यही नहीं, बल्कि उस समय जारी आदेश में यह भी पूछा गया था कि अतिक्रमणों की जानकारी होने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की, दोषी कर्मचारियों की जिम्मेदारी क्यों तय नहीं हुई, और क्या सरकारी भूमि का किसी स्तर पर नियम विरुद्ध नियमन किया गया। इन गंभीर सवालों का भी आज तक सार्वजनिक रूप से कोई जवाब सामने नहीं आया।
रसूखदारों पर कार्रवाई से क्यों बच रहा प्रशासन?
शहर में चर्चा का विषय यह भी है कि चिह्नित अतिक्रमणों में कई प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आने के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन आम लोगों पर तो सख्ती दिखाता है, लेकिन रसूखदारों के मामलों में कार्रवाई करने से बचता है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर वर्षों से प्रमाणित अतिक्रमणों पर बुलडोजर क्यों नहीं चल पाया। जबकि बड़ली क्षेत्र में हाल ही में सरकारी भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के बाद लोगों की उम्मीदें बढ़ी हैं कि अब शहर के पुराने मामलों में भी कार्रवाई होगी। जल स्रोतों की आड और अंगोर भूमि केवल सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं, बल्कि शहर की जल संरक्षण व्यवस्था की महत्वपूर्ण धरोहर है। इन पर कब्जे बने रहने से जल निकासी और पारम्परिक जल स्रोतों का अस्तित्व भी प्रभावित हो रहा है। अब प्रशासनिक अधिकारियों पर शहर की निगाहें लगी हुई हैं, और यह लोगों का मानना है कि बड़ली में 50 बीघा सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाना क्या प्रशासन का नियमित अभियान है या फिर केवल एक प्रतीकात्मक कार्रवाई? यदि प्रशासन वास्तव में अतिक्रमण के खिलाफ समान नीति पर काम कर रहा है तो वर्षों पहले प्रमाणित हो चुके 56 अतिक्रमणों को हटाने की कार्रवाई कब शुरू होगी…? शहर अब इस सवाल का जवाब चाहता है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार: मेरे संज्ञान में यह मामला नहीं आया, देखवाता हूं
मेरे संज्ञान में यह मामला नहीं आया है। इसे दिखवाने के बाद फिर इस संबंध में कानूनी प्रावधान के अनुसार आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण है तो फिर से हटवाया जाएगा।
गोविंद सिंह भींचर, उपखण्ड अधिकारी नागौर