लखावत ने कहा कि हरसोलाव के वीर सपूत बल्लूजी का गौरवमयी इतिहास रहा है। ऐसे वीर महापुरुषों की चीर स्मृति बनाए रखने के लिए हमारी सरकार जगह-जगह स्मारक निर्माण करवा रही है, वहीं १२० महापुरुषों के पाठ विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए जोड़े गए हैं।
तारातरा मठ के मठाधीश प्रतापपुरी महाराज ने कहा कि संगठित होकर समाज को बदला जा सकता है। सामजिक कुरीतियों को मिटाया जा सकता है। बाड़मेर के पूर्व विधायक जालमसिंह रावलोत ने बल्लूजी के जीवन दर्शन के बारे में बताया।
शौर्य से वीर धरा गौरवान्वित- जोधपुर जेएनवीयू के पूर्व कुलपति डॉ. लक्ष्मणसिंह राठौड़ ने कहा कि हरसोलाव में ४२६ वर्ष पूर्व जन्में राव बल्लूजी जैसे महान सपूतों के जीवन दर्शन से नई पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए राव बल्लूजी ने अपने शौर्य एवं पराक्रम से इस वीर धरा को गौरवान्वित किया। उन्होंने कहा कि पुरानी पीढ़ी का इतिहास जानने की जरुरत है। हमारे पूर्वजों ने समाज और देश को साम्प्रदायिक सद्भाव, भाई-चारा और प्रेम का संदेश दिया है।
बल्लूजी के हुए तीन दाह संस्कार- साहित्यकार लक्ष्मणदान कविया ने कहा कि वीर सपूत बल्लूजी के तीन बार दाह संस्कार हुआ। पहला दाह संस्कार २५ जुलाई १६४४ में आगरा किले से अमरसिंह का शव लाने के बाद हुआ। दूसरा दाह संस्कार ४ जनवरी १६८० में तब हुआ जब बादशाह औरगजेब ने मेवाड़ पर चढ़ाई की, तब उदयपुर के महाराणा जगतसिंह से उसकी फौज के साथ देबवारी घाटी में युद्ध हुआ। किड़ीदल के आगे मेवाड़ी फौज दबती जा रही थी तब महाराणा ने बल्लूजी को याद किया। उस युद्ध में बल्लूजी ने बादशाही सेना के छक्के छुड़ा कर वहां पुन: वीरगति को प्राप्त हुए। इसी तरह तीसरा दाह संस्कार उनके मूछ के बाल का उनके पैतृक गांव हरसोलाव में बल्लूजी चांपावत की पांचवी पीढंी में हुए ठाकुर रतनसिंह ने किया। आज भी तीन जगह दाह संस्कार के स्मारक उनकी यादे सजोए हैं।
विद्यार्थियों का सम्मान- समारोह में शोध संस्थान के अध्यक्ष ठा. देवेन्द्रसिंह की ओर से शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रदर्शन कक्षा १० व१२वीं के विद्यार्थियों को स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इससे पूर्व अतिथियों ने किले के बुर्ज पर स्थापित बल्लूजी की विशालकाय मूर्ति का वैदिक मंत्रोचार के साथ अनावरण किया।समारोह में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए क्षत्रिय बंधुओं ने शिरकत की। अतिथियों का माला व साफा पहनाकर स्वागत किया गया।