ड्राप आउट व अनामांकित बच्चों को स्कूल तक लाने में शिक्षकों को आ रहा पसीना, आंगनबाड़ी केन्द्रों के प्रवेश योग्य बच्चों को भी स्कूलों में लाने के लिए हो रही मशक्कत
नागौर. जिले सहित प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासों के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। शिक्षा विभाग की ओर से ड्रॉप आउट और अनामांकित बच्चों को स्कूल की दहलीज तक लाने के लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। शिक्षकों की ओर से घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करने के बावजूद अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। वहीं आंगनबाड़ी केन्द्रों के प्रवेश योग्य बच्चों को भी स्कूलों से जोडऩा आसान नहीं हो रहा।
नागौर जिले की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है। सत्र 2025-26 में जहां कुल नामांकन 1,58,285 रहा, वहीं 2026-27 के लिए 1,74,114 का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके मुकाबले 30 अप्रेल तक केवल 1,51,568 विद्यार्थियों का ही नामांकन हो पाया है, यानी अभी भी 22,546 नामांकन बाकी हैं। राज्य स्तर पर नागौर का स्थान 13वां है, जो स्थिति में सुधार की जरूरत को दर्शाता है। पूरे प्रदेश की बात करें तो इस बार 80 लाख 30 हजार से अधिक बच्चों का नामांकन करना है, लेकिन अब तक 69 लाख 25 ही हो पाया है, यानी अब भी 11 लाख 5 हजार बच्चों का नामांकन करना शेष है।
नागौर की स्थिति
सत्र 2025-26 का नामांकन - 1,58,285
2026-27 का लक्ष्य - 1,74,114
30 अप्रेल तक नामांकन - 1,51,568
लक्ष्य बाकी - 22,546
राज्य में स्थान - 13वां
आंगनबाड़ी केन्द्रों के बच्चों को स्कूल तक लाने में पीेछे
नागौर जिले में आंगनबाड़ी केन्द्रों में नामांकित 6708 प्रवेश योग्य बच्चों में से अब तक केवल 2054 का ही स्कूलों में प्रवेश हो पाया है, जबकि करीब 69 प्रतिशत बच्चों को अभी भी स्कूल से जोडऩा बाकी है। ऐसे में शिक्षा विभाग के लिए लक्ष्य हासिल करना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
प्रदेश टॉप 10 जिले -
बालोतरा, सिरोही, जालोर, बाड़मेर, डीग, भीलवाड़ा, ब्यावर, जैसलमेर, पाली व राजसमंद।
खराब स्थिति वाले 10 जिले -
दौसा, बांसवाड़ा, कोटपुतली-बहरोड़, जयपुर, बारां, सीकर, भरतपुर, प्रतापगढ़, टोंक व करौली।
नामांकन नहीं बढऩे की ये हैं मुख्य वजह
शिक्षा विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन कम होने की प्रमुख वजह शिक्षकों के पद रिक्त होना है। शहरी क्षेत्र की स्कूलों में जहां तृतीय श्रेणी शिक्षकों के पद पिछले लम्बे समय से रिक्त पड़े हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में अंग्रेजी और हिन्दी विषय के पद ही सृजित नहीं किए गए हैं, वहीं विषय विशेषज्ञों के पद भी लम्बे समय से रिक्त हैं। ऐसे में बच्चों को पढ़ाने वाला कोई नहीं है। रही-सही कसर आए दिन आयोजित होने वाले सरकारी कार्यक्रम पूरी कर देते हैं। शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यों में उलझाए रखते हैं, जिसके चलते परीक्षा तक बच्चों का पाठ्यक्रम भी पूरा नहीं हो पाता है। पहले जहां ग्रामीण क्षेत्रों में निजी स्कूलों की कमी थी, वहां अब हर गांव में निजी स्कूलें खुल गई हैं, इसके कारण भी नामांकन बढ़ाने में जोर आ रहा है।
प्रयास जारी है
जिले में अनामांकित व ड्राप आउट बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में करने के लिए शिक्षा विभाग के शिक्षक घर-घर जाकर अभिभावकों से सम्पर्क कर रहे हैं। इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। शत प्रतिशत लक्ष्य हासिल करने के लिए शिक्षकों को समय-समय पर निर्देशित किया जा रहा है।
- रामलाल खराड़ी, मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी, नागौर