
कई युद्धों का गवाह है नागौर किला
नागौर. ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक के साथ ही पुरातात्विक दृष्टि से राजस्थान के मध्य में स्थित नागौर बेहद महत्वपूर्ण रहा है। यहां की प्राचीन इमारतों में अहिछत्रगढ़ के साथ ही नागौर शहर में बने सात दरवाजे अपना विशेष स्थान रखते हैं। शहर के उत्तर पूर्वी भाग में सुल्तानुतारकिनहम्मीदुद्दीन नागौरी की दरगाह और गिन्नाणी तालाब के पास ऐतिहासिक बगीचियां बनी हुई हैं। नागौर की प्राचीन इमारतों में तारकिन का दरवाजा प्रसिद्ध है, जिसे 1230 ई. में इल्तुतमिश ने बनवाया था। जाली झरोखों वाले पुराने मकान शहर की बसावट की विशेषताओं को दर्शाते हैं। शहर के हृदयस्थल में तकरीबन एक हजार वर्ष पुराना ऐतिहासिक बंशीवाला मंदिर है। नई पीढ़ी को इन विरासतों के सहेजने प्रति जागरूक करने की जरूरत है, नहीं तो नागौर शहर अपनी गौरवमय विरासत को भूल जाएगा।
कई युद्धों का गवाह है नागौर किला
नागौर का किला अमरसिंह राठौड़ के नाम से प्रसिद्ध है। यह किला कई युद्धों का गवाह है। अपनी ऊंची दीवारों और विशाल परिसर के लिए प्रसिद्ध है। पर्यटक किले के अंदर कई महलों, फव्वारे, मंदिरों और खूबसूरत बगीचों को देख सकते हैं। किले का निर्माण नागावंशियों ने किया था। बाद में किले को मोहम्मद बहलीन ने पुनर्निर्मित करवाया। किले के छह मुख्य प्रवेश द्वार हैं, पहला प्रवेश द्वार लोहे और लकड़ी के नुकीले कीलों से बना है। दूसरा बिचली पोल, तीसरा कचहरी पोल, चौथा सूरज पोल, पांचवां धुरती पोल, छठा राज पोल है। आखिरी दरवाजे को प्राचीन काल में नागौर की न्यायपालिका के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। किले में
मंदिर के साथ ही हाड़ी रानी महल, अकबरी महल, आभा महल व बख्तसिंहपैलस हैं। यह अपनी सुंदर भित्ति चित्रों व स्थापत्य कला के कारण प्रसिद्ध हैं। इनके समीप ही मुगल शासक शाहजहां के समय निर्मित एक शाहजहांनी मस्जिद है। राजपूताना शैली में बनी सैनिकों की सुंदर छतरियां भी हैं। किले में राधा कृष्ण, देव गणेश, भैरवजी व नाहर माता का मंदिर है। यूनेस्को ने नागौर किले को 2002 में एशिया पेसिफिक हेरिटेज अवार्ड पुरस्कार से नवाजा है।
बेहद शानदार जल प्रबंधन
नागौर का किला में जल संरक्षण का ढांचा बेहद शानदार और वैज्ञानिक विधि से निर्मित है। महल में जल प्रबंधन इस प्रकार था कि फाउण्टेन भी पानी से एक्टिवेट होतेे और उनका पानी भी बहकर वापस बावडिय़ों में चला जाता। इसी प्रकार महल के विभिन्न भागों में पानी की आपूर्ति भी इन्हीं बावडिय़ों से होती थी।
अमर सिंह राठौड़ का इतिहास बताती छतरियां
- जड़ा तालाब के किनारे स्थित वीर अमरसिंह राठौड़ व उनकी रानियों की छतरियां हैं। ये छतरियां वास्तु शिल्प का बेजोड़ नमूना। सोलह खंभों की छतरी वीर अमरसिंह राठौड़ की है। छतरी में पीले, लाल व बलुआ रंग के पत्थर लगे हुए हैं। गुम्बद में फूल-पत्तियों व पशु-पक्षियों की सुंदर नक्कासी बनी हुई है। यह स्मारक सत्रहवीं शताब्दी की राजपूत स्थापत्य कला का नायाब नमूना है।
अब लुप्त होने लगी ऐतिहासिक बावडिय़ा
जिले के नागौर सहित खाटू, कुचामन, मेड़ता, नावां, ताऊसर, मारोठ, डीडवाना, रियां बड़ी सहित अन्य कस्बों में बनी बावडिय़ां बरसों पहले आम के साथ खास लोगों की प्यास बुझाती थी। इनमें कई बावडियां शानदार बनावट व स्थापत्य कला की विशेषताओं को दर्शाती हुई नजर आती है। यह ऐतिहासिक बावडिय़ां आज देखरेख के अभाव में अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं।