राजस्थान के डीडवाना-कुचामन में शिकारियों का क्रूर कारनामा, जहरीला दाना खिलाकर 25 राष्ट्रीय पक्षी मोरों की हत्या, थैले में मिले पंख। उदयपुर में भी फायरिंग।
राजस्थान की शांत और प्रकृति प्रेमी धरती आज उस समय खून के आंसुओं रो पड़ी जब डीडवाना-कुचामन और उदयपुर जिलों से राष्ट्रीय पक्षी मोर के सामूहिक शिकार और हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली खबरें सामने आईं। राष्ट्रीय पक्षी को शिकारियों ने चंद रुपयों के लालच में तड़पा-तड़पा कर मार डाला। नागौर जिले के मकराना उपखंड के अंतर्गत आने वाले गेहड़ा कलां गांव में बुधवार की सुबह एक साथ 25 मोरों के शव मिलने से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई। घटनास्थल पर मोरों के कटे हुए और नोचे गए पंख बोरियों व थैलों में भरे मिले, जो इस बात का साफ सबूत हैं कि इस घिनौने कृत्य के पीछे किसी बड़े और शातिर शिकारी गैंग का हाथ है।
स्थानीय ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों ने जब बुधवार सुबह गांव के पास खेतों और तालाब के पास का नजारा देखा तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। चारों तरफ रंग-बिरंगे मोरों के शव बिखरे पड़े थे।
ग्रामीणों ने रोष व्यक्त करते हुए बताया कि बाहरी क्षेत्रों से आने वाले शिकारी इस पूरे बेल्ट में स्थानीय तालाबों और जलस्रोतों के पास अपना डेरा डाले रहते हैं। वे मोरों को आकर्षित करने के लिए बाजरे और अनाज के दानों में घातक जहर मिलाकर डाल देते हैं।
ग्रामीणों ने बताया कि जहर खाने के कुछ ही मिनटों बाद जब मोर बेदम होकर गिर जाते हैं, तो शिकारी उनके कीमती पंखों को बाजार में अवैध रूप से बेचने के लिए बेरहमी से नोच लेते हैं और उनके मांस की तस्करी करते हैं।
घटना की गंभीरता को देखते हुए गेहड़ा कलां ग्राम पंचायत के प्रशासक मुकेश डारा ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने उपखंड अधिकारी (SDM) मकराना और क्षेत्रीय वन अधिकारी (Ranger) को इस अपराध को अंजाम देने वाले बनबागरियों व अज्ञात शिकारियों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट सौंपकर सख्त धाराओं में मामला दर्ज कराया है।
राष्ट्रीय पक्षी मोरों के इस सामूहिक नरसंहार का मामला जैसे ही प्रशासनिक गलियारों तक पहुंचा, आला अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए। राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण कानूनों के तहत मोर का शिकार बेहद संगीन और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। घटना स्थल पर ग्रामीणों की भारी भीड़ जमा हो गई और उन्होंने आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
माहौल को गरमाता देख मकराना एसडीएम (SDM) अंशुल सिंह ने तुरंत मामले का संज्ञान लिया। उन्होंने गच्छीपुरा थानाधकारियों को निर्देश जारी किए हैं कि वे पुलिस की विशेष टीमें बनाकर जंगलों और संदिग्ध ठिकानों पर दबिश दें और आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजें।
नागौर की इस क्रूर घटना के समानांतर ही झीलों की नगरी उदयपुर के वल्लभनगर उपखंड क्षेत्र से भी शिकार की एक और लाइव वारदात सामने आई। वल्लभनगर के करणपुर गांव में मंगलवार की देर रात अज्ञात शिकारियों ने वन्यजीवों के शिकार के प्रतिबंधित हथियारों का इस्तेमाल किया।
टोपीदार बंदूक से हमला: करणपुर गांव के जंगलों में रात के सन्नाटे में कुछ अज्ञात शिकारी टोपीदार बंदूकों के साथ घुसे। उन्होंने एक ऊंचे पेड़ पर शांति से बैठे एक सुंदर मोर को निशाना बनाकर सीधे फायर झोंक दिया।
ग्रामीणों की सजगता: आधी रात को बंदूक की तेज आवाज सुनकर गांव के लोग जाग गए और लाठियां-टॉर्च लेकर आवाज की दिशा में दौड़ पड़े। ग्रामीणों को अपनी तरफ तेजी से आता देख शिकारी घबरा गए और घने अंधेरे व झाड़ियों का फायदा उठाकर मौके से भागने में सफल रहे। हालांकि, वन विभाग अब उनकी तलाश में जुट गया है।
गेहड़ा कलां के ग्रामीणों ने प्रशासनिक अधिकारियों को एक बड़ी खुफिया जानकारी देते हुए बताया कि यह शिकारी गैंग सिर्फ मोरों तक ही सीमित नहीं है। पश्चिमी और दक्षिणी राजस्थान के इन खुले मैदानी व जंगली इलाकों में इन दिनों अवैध शिकारियों का एक बड़ा नेक्सस एक्टिव है।
| लक्षित वन्यजीव (Wildlife Target) | शिकार की मुख्य वजह (Reason for Poaching) | इस्तेमाल होने वाले हथियार / तरीके |
| राष्ट्रीय पक्षी मोर (Peacock) | चमकीले पंखों की अवैध तस्करी और मांस की बिक्री। | जहरीला दाना (Poisonous Seeds), जाल। |
| भारतीय चिंकारा (Chinkara) | अवैध मांस (Meat) और शौकिया शिकार। | टोपीदार बंदूक (Muzzle-loading Guns), शिकारी कुत्ते। |
| जंगली खरगोश (Hare) | स्थानीय स्तर पर मांस की खपत के लिए। | फंदे (Snarez), लाठी और जाल। |
| नीलगाय (Blue Bull) | खेतों से भगाने के बहाने या मांस के लिए। | भारी बंदूके और तीखे फंदे। |
भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 (Schedule-I) के तहत मोर को सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा प्राप्त है, जिसके तहत शिकार करने पर 7 साल तक की जेल का प्रावधान है। इसके बावजूद मकराना के गेहड़ा कलां और उदयपुर के करणपुर जैसी घटनाएं हमारे सिस्टम और वन विभाग की गश्त पर बड़े सवाल खड़े करती हैं।
अगर समय रहते इन शिकारियों के खिलाफ मरुधरा में कोई बड़ा और कठोर उदाहरण पेश नहीं किया गया, तो राजस्थान के गांवों की पहचान कहे जाने वाले ये सुंदर पक्षी केवल तस्वीरों तक ही सीमित रह जाएंगे।