
नागौर. राजस्थान में कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने और अपराधियों पर शिकंजा कसने के बड़े-बड़े दावों के बीच पुलिस व्यवस्था की जमीनी हकीकत कई सवाल खड़े कर रही है। प्रदेश के पुलिसकर्मियों का यात्रा भत्ता महीनों नहीं, बल्कि कई मामलों में सालभर तक नहीं मिलता है। विधायक ललित मीना के विधानसभा सवाल पर गृह विभाग ने स्वीकार किया है कि प्रदेश के सभी जिलों में पुलिस जवानों के यात्रा भत्ते (टीए बिल) का 50 करोड़ से अधिक भुगतान लंबित है। सरकार ने इसके लिए बजट की सीमित उपलब्धता, पूर्व वर्षों के बकाया बिल और आईएफएमएस पोर्टल की तकनीकी समस्याओं को जिम्मेदार बताया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने विधानसभा में यात्रा भत्ता भुगतान की स्थिति और बकाया बजट का विवरण भी प्रस्तुत किया है, जिसके अनुसार 15 अप्रेल 2026 तक प्रदेशभर में पुलिसकर्मियों के यात्रा भत्ते का कुल बकाया 50 करोड़ रुपए से अधिक है। कई जिलों में फरवरी 2025 के बाद बिलों का भुगतान तक नहीं हो पाया है। इसमें अलवर का 250 लाख, आयुक्तालय जयपुर का 200 लाख, उदयपुर का 300 लाख, कोटा शहर का 288 लाख, जयपुर ग्रामीण व जोधपुर ग्रामीण का 300-300 लाख, नागौर का 250 लाख सहित अन्य जिलों की यही स्थिति है।
यात्रा भत्ता पुलिस व्यवस्था का अहम हिस्सा है, क्योंकि अपराधियों की तलाश, जांच, गिरफ्तारी और न्यायालयी कार्रवाई के लिए पुलिसकर्मियों को लगातार एक जिले से दूसरे जिले तथा कई बार दूसरे राज्यों तक जाना पड़ता है। लेकिन हालात यह है कि कई पुलिसकर्मी अपनी जेब से खर्च कर जांच पूरी करने को मजबूर हैं। विभागीय नियमों के अनुसार अधिकांश मामलों में रोडवेज बस या रेल से यात्रा की अनुमति है, लेकिन उसका भुगतान भी समय पर नहीं हो रहा।
मजबूरी में लेते है परिवादी पक्ष का सहयोग
पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों का कहना है कि कई बार अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए दूसरे जिलों या राज्यों में जाने के लिए पर्याप्त सरकारी वाहन उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में परिवादी पक्ष या परिचितों के माध्यम से निजी वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है। दूसरी ओर अपराधी आधुनिक तकनीक और लग्जरी वाहनों का उपयोग कर रहे हैं, जबकि पुलिस का एक बड़ा हिस्सा पुराने वाहनों और सीमित संसाधनों पर निर्भर है।
राजनीतिक आयोजनों पर खर्च, पुलिस के लिए बजट की कमी
पुलिसकर्मियों और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जब राजनीतिक रैलियों, वीआईपी दौरों और अन्य आयोजनों में करोड़ों रुपए का ईंधन और संसाधन खर्च किए जाते हैं, तब कानून-व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पुलिस बल के यात्रा भत्ते के लिए बजट की कमी का तर्क समझ से परे है। उनका मानना है कि यदि पुलिस को समय पर संसाधन, वाहन और यात्रा भत्ता उपलब्ध नहीं कराया गया तो अपराध नियंत्रण और जांच की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
बड़ा सवाल
अपराधियों के पास लग्जरी गाडिय़ां हैं, आधुनिक संसाधन हैं और वे तेजी से एक जिले से दूसरे जिले तक पहुंच जाते हैं। वहीं पुलिसकर्मी पुराने वाहनों, सीमित संसाधनों और रोडवेज बसों के सहारे अपराधियों का पीछा करने को मजबूर हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पुलिसकर्मी बुनियादी सुविधाओं और भुगतान के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब अपराधियों पर प्रभावी कार्रवाई और कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने के सरकारी दावे कितने कारगर साबित होंगे।
देरी से देते हैं और भी पूरा नहीं
कानून-व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी पुलिस विभाग के लिए सरकार हमेशा बजट में कटौती करती है। पूरा बजट नहीं मिलने से एक तो यात्रा भत्ता समय पर नहीं मिलता और जो मिलता है, उसमें कटौती कर देते हैं। इससे सेवानिवृत्त पुलिसकर्मियों को ज्यादा परेशानी होती है।
- साबिर हुसैन, महासचिव, राजस्थान सेवानिवृत्त पुलिस कल्याण संस्थान, नागौर