नागौर

रेगिस्तानी माटी की पुकार: नागौर में पर्यावरण संरक्षण व हरित भविष्य की ओर बढ़ते कदम

नागौर जिले में पिछले 10-15 वर्षों में पर्यावरण के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं, वे अनुकरणीय हैं। पौधे लगाने से लेकर उसे पेड़ बनाने में आमजन की ओर से जो मेहनत और प्रयास किए जा रहे हैं, वे जिम्मेदार विभागों की नाकामी को भी ढंक रहे हैं

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Apr 22, 2026
हरीमा में विकसित किया गया जंगल

नागौर. राजस्थान के हृदय स्थल में बसा नागौर जिला सूखे और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच संरक्षण की एक नई कहानी लिख रहा है। ऐतिहासिक रूप से जल संकट और विपरीत मौसमी परिस्थितियों का सामना करने वाला यह क्षेत्र, अब सामुदायिक जन भागीदारी, तकनीक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के दम पर अपनी धरती को संवारने में जुटा है। नागौर जिले में पिछले 10-15 वर्षों में पर्यावरण के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं, वे अनुकरणीय हैं। पौधे लगाने से लेकर उसे पेड़ बनाने में आमजन की ओर से जो मेहनत और प्रयास किए जा रहे हैं, वे जिम्मेदार विभागों की नाकामी को भी ढंक रहे हैं। हालांकि यह भी सही है कि जिले में लाइम स्टोन, बजरी, जिप्सम सहित अन्य खनिजों का अंधाधुंध अवैध खनन से पर्यावरण को हानि पहुंचा रहा है।

जल सरंक्षण: पहली प्राथमिकता, ‘वंदे गंगा’ का संकल्प

नागौर में भूजल स्तर लगातार नीचे जाने और फ्लोराइड युक्त पानी की समस्या गंभीर रही है। अब पर्यावरण दिवस और पृथ्वी दिवस के परिप्रेक्ष्य में, ‘वंदे गंगा जल संरक्षण जन अभियान’ के तहत परंपरागत जल स्रोतों, तालाबों और जोहड़ों के जीर्णोद्धार पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में राजस्थान पत्रिका की ओर से चलाए जा रहे अमृतम जलम अभियान से लोगों में परंपरागत जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर काफी जागरुकता आई है।

पारंपरिक ज्ञान: जिले में ग्रामीण जल संचयन के प्राचीन तरीकों को फिर से अपना रहे हैं। वहीं शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अपना कर बारिश का जल संजोया जा रहा है। इसके साथ वर्षा जल संचयन के लिए लोगों को प्रेरित किया जा रहा है, ताकि हर बूंद को बचाया जा सके।

पौधरोपण और हरियाली की ओर कदम

शुष्क जलवायु के बावजूद, नागौर के नागरिक और स्वयंसेवी संस्थाएं जिले को हरा-भरा बनाने में लगी हैं। पिछले काफी वर्षों से प्रशासन के साथ आमजन की ओर से जिले भर में पौधरोपण के विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसके साथ स्थानीय प्रजातियां- रोहिड़ा, खेजड़ी और बबूल जैसे रेगिस्तानी पेड़, जो कम पानी में भी जीवित रह सकते हैं, उन्हें लगाने पर जोर दिया जा रहा है। इस दिशा कॉलेज शिक्षक डॉ. प्रेमसिंह बुगासरा, स्कूल व्याख्याता धनराज खोजा, प्रधानाध्यापक धर्मपाल डोगीवाल, सेवानिवृत्त इलेक्ट्रीशियन सुखराम चौधरी, पद्मश्री हिम्मताराम भांभू ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने सैकड़ों-हजारों पौधे लगाकर उन्हें पेड़ बनाने का काम किया है। जिनसे हजारों लोग प्रेरित भी हुए हैं।

प्लास्टिक मुक्त नागौर: जागरूकता और पहल

प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए ‘रन फॉर एनवायरमेंट’ (पर्यावरण के लिए दौड़) जैसे आयोजनों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है। समय-समय पर लोगों को प्लास्टिक के स्थान पर कपड़े के थैलों का उपयोग करने की अपील की जाती है। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की ओर से आम जनता को बाजार जाते समय घर से कपड़े का थैला साथ ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। कई बार कपड़े की थैलियां वितरित भी की गई।

औद्योगिक और खनन क्षेत्रों में पर्यावरण सुरक्षा

नागौर में माइनिंग (खनन) एक प्रमुख उद्योग है। सीमेंट कम्पनियों को पर्यावरण मंजूरी (ईसी) के लिए होने वाली जनसुनवाई में, मूण्डवा, खींवसर, जायल व नागौर तहसील क्षेत्रों में पर्यावरण संतुलन को प्राथमिकता दी जा गई। इसके साथ सतत खनन (सस्टेनेबल माइनिंग) के लिए खनन के दौरान भूजल स्तर को बचाने और वनीकरण पर जोर दिया जा रहा है।

ऊर्जा संरक्षण: सोलर का बढ़ता उपयोग

पर्यावरण संरक्षण में सौर ऊर्जा की भूमिका को देखते हुए, नागौर में ‘पीएम कुसुम योजना’ (कम्पोनेंट-सी) के तहत सौर ऊर्जा से चलने वाले कृषि पंपों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे बिजली की खपत कम हो और कार्बन फुटप्रिंट में कमी आए।

Published on:
22 Apr 2026 11:40 am
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