विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर विशेष - युवाओं में घट रहा जीवन के संघर्षों से लडऩे का हौसला, छोटी सी असफलता पर गले लगा रहे मौत
नागौर. देश में 15 से 29 साल के किशोरों व युवाओं को संभालने की आवश्यकता है। आत्महत्या इस उम्र के युवाओं की जान जाने का दुर्घटना के बाद सबसे बड़ा कारण बन गया है। मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार देश में हर घंटे में 20 से अधिक लोग आत्महत्या (सुसाइड) कर हैं। विश्व की बात करें तो हर साल 8 लाख लोग अकाल मौत को गले लगा रहे हैं। यह संख्या वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है, इसको देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 2024 के लिए विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की थीम ‘चेंजिंग द नैरेटिव ऑन सुसाइड’ रखी है, ताकि युवाओं को सुसाइड करने से रोका जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार विश्व भर के 60 से अधिक देशों में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य आत्महत्या को रोकने के लिए जागरुकता बढ़ाने व इस कलंक को कम करने और आत्महत्या और आत्मघाती व्यवहार को रोकने के लिए कार्रवाई को प्रोत्साहित करने का है।
कोरोना महामारी के बाद आत्महत्या के मामलों अप्रत्याशित वृद्धि
देश के साथ जिले व प्रदेश में आत्महत्या के मामलों में साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है। खासकर कोरोना महामारी के दौरान आत्महत्या के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई, जिसमें महामारी खत्म होने के बाद थोड़ी-सी कमी हुई है, लेकिन फिर भी जिस प्रकार युवा अकाल मौत को गले लगा रहे हैं, वह समाज के लिए चिंताजनक है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राजस्थान में आत्महत्या की दर वर्ष 2015 में जहां एक लाख पर 4.8 थी, वहां 2022 में 7.2 हो गई।
प्रदेश में पांच हजार से ज्यादा हर साल कर रहे आत्महत्या
राजस्थान प्रदेश में हर साल 5 हजार से अधिक लोग आत्महत्या कर रहे हैं, इसमें छात्रों की संख्या अधिक है, जो विभिन्न कारणों से आत्महत्या कर रहे हैं। पुलिस विभाग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 में 4860, वर्ष 2014 में 4459, वर्ष 2015 में 3457, वर्ष 2016 में 3678, वर्ष 2017 में 4188 ने आत्महत्या की। इसी प्रकार वर्ष 2018 में 4333, वर्ष 2019 में 4531, वर्ष 2020 में 5658, वर्ष 2021 में 5593 तथा वर्ष 2022 में 5343ने अकाल मौत को गले लगाया। मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक डरावनी तस्वीर है, जिसे रोकने के प्रयास नहीं किए गए तो यह आंकड़ा दिनों-दिन बढ़ता जाएगा।
आत्महत्या करने वालों के परिवार हो जाते हैं उनसे ज्यादा दु:खी
मनोरोग विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर सुसाइड करने वाला यह सोचता है कि उसके मरने से समस्या का समाधान हो जाएगा, लेकिन वह यह नहीं जानता कि आत्महत्या करना समस्या का समाधान नहीं है। जिले में कई परिवार ऐसे हैं, जिनके घर में कमाने वाले ने ही आत्महत्या कर ली, जिसके कारण उसके परिवार के लोग ज्यादा दु:खी हो गए। कई बच्चे लावारिस हो गए तो कई महिलाएं नरक की जिंदगी जी रही हैं।
युवाओं में खत्म हो रहा है धैर्य
विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या करने का मुख्य कारण हमारा पाश्चाात्य संस्कृति को फॉलो करना है। परिवार व रिश्ते दिनों-दिन छोटे होते जा रहे हैं। दूसरा बड़ा कारण बच्चों के हाथों में मोबाइल आना भी है, सोशल मीडिया के साथ ऑनलाइन गेम बच्चों को आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं। इसके साथ आत्महत्या करने के पीछे मुख्य वजह डिप्रेशन में आना तथा नशा माना जा रहा है।
डिप्रेशन व नशा मुख्य कारण
वर्तमान में 15 से 29 साल के युवा सबसे ज्यादा आत्महत्या कर रहे हैं। यह चिंता का विषय है कि दुर्घटना के बाद सबसे ज्यादा मौतें आत्हहत्या से हो रही हैं और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। आत्महत्या करने के पीछे सबसे बड़े कारण डिप्रेशन व नशे का माना जा रहा है। आत्महत्या के प्रकरण रोकने के लिए प्रदेश में टेली मानस प्रोग्राम भी चलाया जा रहा है, जिसके टोल फ्री नम्बर 14416 पर सातों दिन 24 घंटे कॉल किया जा सकता है, हाथों हाथ संबंधित जिले के मनोरोग विशेषज्ञ से बात होगी।
- डॉ. राधेश्याम रोज, मनोरोग विशेषज्ञ, जेएलएन अस्पताल, नागौर