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नागौर जिले के गांवों में बदलाव की बयार, कुरीतियों पर चोट कर रहे पढ़े-लिखे युवा

बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान, मौसर व शादी समारोहों में फिजूलखर्ची पर लगाम, ग्राम स्तर पर विभिन्न समाजों में हो रही बैठकों में ले रहे खर्च कम करने के निर्णय

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रूण गांव में सामाजिक सुधारों को लेकर बैठक करते ग्रामीण

रूण गांव में सामाजिक सुधारों को लेकर बैठक करते ग्रामीण

नागौर. जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों बदलाव की बयार चल रही है। लंबे समय से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों और दिखावे की परंपराओं पर अब पढ़े-लिखे युवा खुलकर सवाल उठा रहे हैं। गांव-गांव में विभिन्न समाजों की बैठकों का दौर शुरू हो गया है, जहां मौसर, पहरावणी-ओढ़ावणी और शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में बढ़ते खर्च को कम करने के ठोस निर्णय लिए जा रहे हैं।

ग्रामीण समाज में वर्षों से शादी समारोहों और मौसर में खर्च करने की परंपरा रही है, जो पिछले कुछ सालों में कम होने की बजाए और अधिक बढ़ गया। इससे गरीब और मध्यम परिवार कर्ज तले दब रहे हैं, वहीं कपड़ों का लेन-देन बेवजह हो रहा है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। लोक-लाज और सामाजिक दबाव के चलते परिवार अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद कर्ज लेकर भी इन रस्मों, जो कुरीतियों का रूप ले चुकी है, को निभाते रहे हैं। खासतौर पर पहरावणी-ओढ़ावणी में कपड़ों और गहनों का लेन-देन, बारात सत्कार और भोज पर लाखों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। इससे कई परिवार कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। अब शिक्षित युवा इस सोच को बदलने के लिए आगे आ रहे हैं। हाल ही में गागुड़ा, दधवाडा, दधवाडी व सिराधना के साथ रूण, ओलादन सहित कई गांवों में समाज स्तर पर बैठकों का आयोजन कर यह निर्णय लिया गया कि बुजुर्गों की मृत्यु पर होने वाले मौसर और शादी समारोह सादगीपूर्ण होंगे। कपड़ों के लेन-देन को सीमित किया जाएगा, गहनों की मात्रा तय की जाएगी और अनावश्यक रस्मों को समाप्त किया जाएगा। मौसर में भी दिखावे और भीड़भाड़ की बजाय सीमित लोगों के साथ सादगी से कार्यक्रम करने पर सहमति बन रही है।

चार गांवों की सामूहिक बैठक में सर्वसम्मति से लिए निर्णय

गत 25 जनवरी को सिराधना फांटा स्थित वीर तेजाजी मंदिर प्रागंण में चार गांव गागुड़ा, दधवाड़ा, दधवाडी व सिराधना जाट समाज के मौजिज लोगों ने बैठक कर सामूहिक निर्णय लिया और समाज में व्याप्त कुरीतियों पर अंकुश लगाने के लिए प्रस्ताव पारित किए, जिनमें मुख्य रूप से शादी के समय पड़ला में सोना अधिकतम 5 तोला ही ले जाना है, मृत्युभोज में तीन व्यंजनों लापसी, आटा का हलवा, नुकती (बूंदी) में से कोई व्यंजन कर सकेंगे। साथ में पकोड़ी, सब्जी-रोटी पुड़ी11वां और 12वां पर ही कर सकेंगे। हरिद्वार जाने के समय किसी भी प्रकार का भोजन (खाना) नहीं बनाया जाएगा एवं गुड़ नहीं बांटा जाएगा। 12 दिनों में मनुहार के लिए अफीम, सीगरेट, काजू व दाख (ट्रे) की पाबन्दी रहे। 12वें दिन के बाद अपने रिश्तेदारों को दुबारा नहीं बुलाएंगे। शोक - सन्देश (चिट्टी) वितरण घर- घर नहीं भेज कर वॉट्सएप से ही भेजे जाएंगे व फोन से बात कर लेंगे। मायरा व पहरावणी में मात्र परिवार के नजदीकी रिश्तेदारों को ही वस्त्र देंगे। बारात व मायरा में डीजे पर पाबंदी, बारात में बराती सीमित लेकर जाएंगे। विवाह के दौरान में घोडिय़ां गाने पर बर्तन बांटना और तेरुडा बांटना पूर्णत: प्रतिबंधित किया गया है। रूण, खजवाना व ओालदन में आयोजित बैठक में भी इसी प्रकार के महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं।

बच्चों की शिक्षा पर हो खर्च

मेड़ता क्षेत्र के ओलादन गांव में आयोजित बैठक में ग्रामीणों ने महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए फालतू के खर्चे बंद करने का निर्णय लिए। गांव के देवाराम, आदुराम, दुर्गाराम, शैतानराम, रामाकिशन, छगनाराम, हरेन्द्र आदि ने बताया कि दिखावे में खर्च करने से बेहतर है कि वही धन बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर लगाया जाए। कई परिवारों ने यह संकल्प लिया है कि वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने और कौशल प्रशिक्षण में निवेश करेंगे। गांवों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढऩे से नई पीढ़ी सामाजिक बदलाव की अगुआ बन रही है।

प्रशासन अब भी उदासीन

हालांकि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने की दिशा में प्रशासन की भूमिका अब भी सीमित नजर आती है। राज्य सरकार समय-समय पर मृत्यु भोज बंद करने के फरमान तो जारी करती है, लेकिन स्थानीय अधिकारी शिकायत के बावजूद कार्रवाई करने से कतराते हैं। गत दिनों रायधनु के शिवपुरा में मृत्यु भोज की शिकायत के बावजूद प्रशासन ने गंभीरता से नहीं लिया, जिसके चलते मृत्यु भोज हो गया। इसी प्रकार जयपुर के जोहार जागृति मंच ने गत 6 फरवरी को लूणदा में मृत्युभोज होने की शिकायत की, लेकिन प्रशासन ने फौरी तौर पर कार्रवाई कर इतिश्री कर ली, जिसके कारण मृत्युभोज हो गया। गौरतलब है कि मृत्युभोज कानूनन अपराध है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम करने वाले समाज सुधारकों का मानना है कि यदि समाज स्वयं नियम बनाकर उनका पालन करे तो बदलाव स्थायी हो सकता है। नागौर जिले के कई गांवों में युवाओं एवं पंचों की ओर से लिए गए निर्णयों से सकारात्मक संदेश जा रहा है। यदि यह पहल निरंतर जारी रही तो आने वाले समय में सामाजिक कुरीतियों पर अंकुश लगाना आसान होगा। ग्रामीण अंचल में उठी यह नई सोच केवल खर्च कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पढ़े-लिखे युवाओं की यह पहल आने वाली पीढिय़ों के लिए नई राह तैयार कर रही है।