
नागौर. जिले में इस बार इंद्र भगवान पूरी तरह मेहरबान नहीं हुए हैं। जिले के कई हिस्से आज भी बारिश के लिए तरस रहे हैं। 18 जुलाई तक रिकॉर्ड की गई बारिश के आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले में पिछले डेढ़ महीने में 158 एमएम औसत बारिश हुई है, जबकि गत वर्ष इसी अवधि में 214 एमएम बारिश रिकॉर्ड की गई थी। इस प्रकार हम देखें तो 58 एमएम औसत बारिश गत वर्ष की तुलना में इस बार कम हुई है। कम बारिश का असर खरीफ बुआई पर भी पड़ा है। जुलाई आधा बीतने के बावजूद कृषि विभाग का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया है। कृषि विभाग के उपनिदेशक हरजीराम चौधरी ने बताया कि इस बार विभाग ने जिले में 11 लाख 76 हजार हैक्टेयर बुआई का लक्ष्य रखा था, जिसकी तुलना में अब तक 10 लाख 5 हजार 116 हैक्टेयर बुआई हो चुकी है। इसके अनुसार जिले में करीब पौने दो लाख हैक्टेयर बुआई होना शेष है। गौरतलब है कि गत वर्ष जिले में लक्ष्य से अधिक बुआई हुई थी।
जानिए, कहां कितनी बारिश
तहसील - बारिश (एमएम में)
नागौर - 110
मूण्डवा - 176
खींवसर - 83
जायल - 101
मेड़ता - 166
रियां बड़ी - 227
डेगाना - 86
डीडवाना - 256
लाडनूं - 171
परबतसर - 151
मकराना - 74
नावां - 256
कुचामन - 203
कुल औसत बारिश - 158.5 एमएम
डीडवाना-नावां में सबसे ज्यादा
जिले में अब तक हुई बारिश के आंकड़ों पर नजर डालें तो नावां व डीडवाना में सबसे अधिक 256 एमएम बारिश रिकॉर्ड की गई है। इसी प्रकार रियां बड़ी में 227 एमएम तथा कुचामन में 203 एमएम बारिश हुई है। वहीं दूसरी तरफ मकराना में मात्र 74 एमएम व खींवसर में 83 एमएम बारिश हुई है, जो जिले में सबसे कम है। डेगाना में भी 86 एमएम बारिश हुई है।
नाडी-तालाब भी सूखे
खींवसर तहसील क्षेत्र सहित जिले के कई हिस्से ऐसे हैं जहां बारिश की मात्रा काफी कम है, जिसके कारण नाडी-तालाबों में भी पानी की आवक नहीं हो पाई है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में पशओं के साथ लोगों को भी पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।
फसलों को चाहिए बारिश
हालांकि शुरुआती बारिश से ज्यादातर किसानों ने खरीफ की बुआई कर ली, लेकिन उसके बाद दुबारा बारिश नहीं होने से जिले के कई क्षेत्रों में फसलें जलने लगी हैं। कृषि विशेषज्ञों एवं किसानों का कहना है कि चार-पांच दिन में बारिश नहीं हुई तो किसानों को काफी बड़ा नुकसान झेलना पड़ेगा। गौरतलब है कि खाद-बीज व ट्रेक्टर की किराया मिलाकर बुआई में किसानों को काफी खर्च करना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ जिले के कई गांव ऐसे भी हैं जहां अधिक बारिश होने से फसलें पानी में डूब चुकी हैं।