
नागौर. रामद्वारा केशव दास महाराज बगीची बख्तासागर में भागवत कथा पर प्रवचन में मंहत जानकीदास महाराज ने ग्रह्स्थ धर्म का महत्व पर वर्णन किया। उन्होंने कहा कि वेदों ने स्त्री को भक्ति का साधन माना है। स्त्री धर्मपत्नी है। गृहस्थ जीवन में काम सुख गौण व धर्म मुख्य है । कन्यादान महान पुण्य दान है। स्वर्ण का दान, चांदी का दान आदि जड़ वस्तुओं दान है, परंतु कन्यादान चेतन का दान है। गृहस्थ धर्म में अकेला पुरुष भक्ति नहीं कर सकता है। अकेले स्त्री भी भक्ति नहीं कर सकती है। स्त्री अपार धैर्य व स्नेह होता है। यह न केवल बच्चों को संस्कारित करने का कार्य करती है, बल्कि पति की महत्ता में भी इसका अहमद योगदान रहता है। जिस स्त्री को पति में परमात्मा का दर्शन नहीं होता है। उसको किसी मंदिर की मूर्ति में भी भगवान का दर्शन नहीं होता है। पति-पत्नी लक्ष्मी नारायण का स्वरूप है । पति अपनी पत्नी को लक्ष्मी की भावना से देखें और पत्नी भी पति में नारायण की भावना रखे तो घर स्वर्गमय हो जाता है। पत्नी नाव का स्वरूप एवं पति नाविक है। दोनों एक-दूसरे के बिना चल नहीं सकते हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि सावधानी के साथ गृहस्थ धर्म पालन करने वालों का धर्म भी श्रेयस्कर है। इस दौरान धनराज रांकावत ,भंवर दास वैष्णव ,दयाराम तेली ,बाबूलाल तेली, सत्यनारायण सेन ,संत मि_ूराम आदि मौजूद थे।