
दिनेश कुमार स्वामी @ लाडनूं (नागौर)। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के नव प्रतिष्ठित युवाचार्य और महासंघ के भावी उत्तराधिकारी महावीर कुमार ने कहा कि आज सबसे बड़ी जरूरत मानवता को मजबूत करने और नई पीढ़ी को चरित्रवान बनाने की है। व्यक्ति जैन बने या नहीं बने, लेकिन अच्छा इंसान यानी गुड मैन जरूर बनें। उसके जीवन से मानवता का संदेश जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि नशा आज समाज के सामने बड़ी चुनौती है। धर्मसंघ की ओर से लोगों को नशामुक्ति के लिए प्रेरित किया जा रहा है और अब तक एक करोड़ से अधिक लोगों को नशामुक्ति का संकल्प दिलाया जा चुका है। पत्रिका ने युवाचार्य महावीर से विशेष बातचीत में युवा और धर्म, भावी समाज, तेरापंथ धर्मसंघ, दर्शन और अध्यात्मिकता के विषय रखे। जिन पर युवाचार्य के विचारों का सार यहां दस बिन्दूओं में प्रस्तुत है-
युवाचार्य महावीर ने कहा कि युवा चरित्र सम्पन्न बने और अपने जीवन में अच्छे संस्कारों को अपनाए, यह समय की जरूरत है। हमारा प्रयास धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बनाने का है। इसके लिए व्यक्ति के भीतर परिवर्तन जरूरी है। केवल बाहरी विकास से समाज बेहतर नहीं बन सकता, बल्कि व्यक्ति के आचरण और विचारों में भी सकारात्मक बदलाव आना चाहिए।
उन्होंने आचार्य तुलसी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि मानव तो मानव है और धर्म करने का अधिकार मानव मात्र को है। धर्म किसी एक व्यक्ति या वर्ग की जागीर नहीं है। इसी विचार को समाज तक पहुंचाने के लिए आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन चलाया, जो पिछले 75 वर्षों से लोगों को नैतिक जीवन और संयम का संदेश दे रहा है।
युवाचार्य ने कहा कि अणुव्रत आंदोलन का मूल उद्देश्य व्यक्ति के जीवन में छोटे-छोटे संकल्पों के माध्यम से बड़ा परिवर्तन लाना है। व्यक्ति अपने जीवन में बुराइयों को कम करे, नशे से दूर रहे और नैतिक मूल्यों को अपनाए तो समाज में भी सकारात्मक बदलाव आएगा।
जैन धर्म के इतिहास और तेरापंथ की परंपरा पर युवाचार्य ने बताया कि भगवान महावीर के समय श्वेतांबर और दिगंबर परंपराएं एक साथ थीं। करीब एक हजार वर्ष तक दोनों साथ रहे, इसके बाद दोनों अलग-अलग परंपराओं के रूप में विकसित हुए। श्वेतांबर परंपरा में भी आगे चलकर मूर्तिपूजक और अमूर्तिपूजक परंपराएं बनीं।
तेरापंथ की स्थापना आचार्य भिक्षु ने की थी। आचार्य भिक्षु से शुरू हुई यह परंपरा भगवान महावीर के सिद्धांतों और विचारों को आगे बढ़ाने वाली धर्मसंघ की विशिष्ट परंपरा के रूप में विकसित हुई। तेरापंथ धर्मसंघ की पहचान उसके अनुशासन और मर्यादा से है। इसी आधार पर धर्मसंघ का संचालन होता है।
युवाचार्य ने बताया कि तेरापंथ धर्मसंघ में अब तक दस आचार्य हो चुके हैं। वर्तमान में आचार्य महाश्रमण 11वें आचार्य हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में आचार्य पद संभाला। तेरापंथ धर्मसंघ की सबसे बड़ी विशेषता उसका अनुशासन और मर्यादा है।अनुशासन केवल संगठन चलाने के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीवन को व्यवस्थित और सार्थक बनाने के लिए भी जरूरी है। यदि व्यक्ति अपने जीवन में संयम, अनुशासन और नैतिकता को अपना ले तो परिवार, समाज और देश के स्तर पर भी उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है।
युवाचार्य ने कहा कि जब तक आचार्य महाश्रमण हैं, उनकी ही प्राथमिकताएं रहेंगी। लम्बे काल तक उनका आश्रय मिले, ऐसी कामना करते हैं। मेरे सुझाव भी आचार्य के माध्यम से होंगे। उनके दिशा- निर्देशन में काम करते रहेंगे।
युवाचार्य ने कहा कि प्रेक्षा ध्यान का प्रकल्प चल रहा है। केवल प्रवचन से बदलाव नहीं आएगा, प्रयोग भी जरूरी है। इसके बिना उद्देश्य परिवर्तन नहीं आएगा। जीवन विज्ञान भी एक प्रकल्प है। युवाचार्य ने कहा कि आचार्य महाश्रमण का कहना है कि जब तक भावी पीढ़ी संस्कारवान नहीं बनेगी, हमारा देश तरक्की नहीं करेगा।
युवाचार्य ने कहा कि भावी पीढ़ी अच्छी बने, प्रारंभ से ही बच्चों में कैसे संस्कार आए। उनका जीवन संयमित बने, गुस्से पर नियंत्रण हो। उन्होंने कहा कि ऐसा एक पाठ्यक्रम बनाया है, जो एक से कॉलेज तक चलता है। आचार्य महाश्रमण के निर्देशन में मानव जाति के कल्याण के लिए काम कर रहे हैं।
युवाचार्य ने कहा कि हजारों साल पहले पांच बिन्दुओं पर आधारित धर्म संघ का सबसे छोटा संविधान बनाया गया। इसमें सभी साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहेंगे, विहार व चातुर्मास कहां करना है यह आचार्य तय करेंगे, आचार्य ही उत्ताराधिकारी बनाएंगे, जो योग्य होगा। शिष्य जितने भी होंगे, सभी आचार्य के होंगे। दीक्षा भी आचार्य के नाम से देंगे।