नरसिंहपुर

गन्ने की सूखी पत्तियों से कहीं बिजली तो कहीं बायोफ्यूल बनाने की तैयारी

crop residue management
crop residue management

new model for weed and crop residue management

जिले में गन्ने की सूखी पत्तियोंए नरवाई और अन्य फसल अवशेषों के प्रबंधन को लेकर एक नई और पर्यावरण.अनुकूल पहल शुरू हुई है। अब तक जिन अवशेषों को किसान मजबूरी में जला देते थे, वही अवशेष अब बिजली, बायोफ्यूल और जैविक खाद का स्रोत बन रहे हैं। इस पहल से न केवल किसानों को पराली जलाने की समस्या और सैटेलाइट निगरानी के दबाव से राहत मिलेगीए बल्कि उन्हें भविष्य में अतिरिक्त आमदनी का अवसर भी मिलेगा।


तीन एजेंसियां कर रहीं संग्रहण,खेतों में दौड़ रहे 50 बेलर


जिले में वर्तमान में तीन निजी एजेंसियां गन्ने की सूखी पत्तियों और नरवाई के संग्रहण में सक्रिय हैं। इसके लिए खेत.खेत जाकर 50 बेलर मशीनें काम कर रही हैं, जो फसल अवशेषों को संकुचित कर संग्रहण योग्य बनाती हैं। प्रशासन और कृषि विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार अब तक लगभग 5291 मीट्रिक टन फसल अवशेषों का संग्रहण किया जा चुका है, जो करीब 2800 हेक्टेयर क्षेत्र से एकत्र किया गया है। इस प्रक्रिया से खेत साफ रहते हैं और किसानों को आग लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।


कहां बन रही बिजली, कहां बायोफ्यूल


जिले में अलग.अलग एजेंसियों के माध्यम से फसल अवशेषों का उपयोग किया जा रहा है। कृषि उपसंचालक मौरिस नाथ ने बताया कि बायो ग्रिड इंडिया, कौंडिया नरवाई की खरीद कर उससे बिजली उत्पादन कर रही है। ग्रीन इंडिया बायो फि निश गाडरवारा बेलर से तैयार पेललेट्स बनाकर एनटीपीसी को सप्लाई कर रही है। इसके अलावा इंडिया बायो फ्यूल, मोहपानी क्षेत्र में भी गन्ने की सूखी पत्तियों और अन्य अवशेषों का कलेक्शन किया जा रहा है।
पराली जलाने से मिलेगी स्थायी मुक्ति
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि किसानों को पराली और नरवाई जलाने की मजबूरी से मुक्ति मिल रही है। खेतों में आग लगाने से जहां वायु प्रदूषण बढ़ता था, वहीं अब वही अवशेष उपयोगी संसाधन बन रहे हैं। इससे खेतों में आग लगने की घटनाएं कम होंगी और आसपास के गांवों व शहरों में धुएं से होने वाली परेशानी भी घटेगी।


पर्यावरण और मृदा स्वास्थ्य को होगा फ ायदा


कृषि वैज्ञानिक डा आशुतोष शर्मा के अनुसार फ सल अवशेष जलाने से खेत की मिट्टी की ऊपरी सतह अत्यधिक गर्म हो जाती है, जिससे वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है और मृदा स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने बताया कि आग से खेतों में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव और केंचुए नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। यदि पूरे जिले में गन्ने की सूखी पत्तियों से सीबीजी और अन्य उत्पाद बनाने की यह प्रक्रिया अपनाई जाती हैए तो खेतों की मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, मिट्टी का क्षरण रुकेगा और पानी को संरक्षित करने की क्षमता भी बढ़ेगी।


जैविक खेती को मिलेगा बढ़ावा


कृषि उपसंचालक के अनुसार पराली, नरवाई और गन्ने की सूखी पत्तियों से बिजली,फ्यूल और खाद निर्माण फसल अवशेष प्रबंधन का एक बेहतर और टिकाऊ माध्यम है। इससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी का नया स्रोत मिलेगा।फ सल अवशेषों से नाडेप और वर्मी कम्पोस्ट खाद भी तैयार की जा सकती है। जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और जैविक खेती को प्रोत्साहन मिलेगा।
वर्जन
यह एक अच्छी और उम्मीद भरी शुरुआत है। यह पहल भविष्य में न केवल किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभदायक साबित होगी, बल्कि पर्यावरण सुरक्षा और मृदा संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जिले में इस अभिनव प्रयोग से अन्य किसान भी प्रेरित होंगे और फसल अवशेष प्रबंधन के बेहतर विकल्पों को अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
मोरिस नाथ उपसंचालक कृषि

Updated on:
20 Jan 2026 02:50 pm
Published on:
20 Jan 2026 02:50 pm
Also Read
View All
बालिका का अपहरण कर बलात्कार के बाद हत्या, आरोपी युवक गिरफ्तार, आरोपी ने बालिका से कहा था कि घर चलो पापा बुला रहे हैं

धार्मिक स्थलों में चोरी करने वाले गिरोह का पर्दाफाश, चार आरोपी गिरफ्तार, चोरी गई 100 वर्ष पुरानी प्रतिमाएं व सिंहासन बरामद

सरकारी स्कूलों में नरसिंहपुर सबसे आगे, निजी में साईंखेड़ा का दबदबा जिले में 53.46 प्रतिशत सरकारी व 46.54 प्रतिशत स्कूलों में नामांकन

डॉक्टर ने लिखी थी हत्या की स्क्रिप्ट, आनंद मुख्य किरदार, इंदिरानगर हत्याकांड के वक्त आरोपी एक-दूसरे को दे रहे थे पल-पल की अपडेट

साहब, कहां गई हमारी सडक़ और नाली? सात साल बाद भी कार्य नहीं वार्ड के नागरिक नगर प्रशासन से कर रहे सवाल