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मनमोहन सिंह ने दिया अल्टीमेटम; पी चिदंबरम, मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठे और कुछ ही घंटों में खत्म हो गया था इंपोर्ट लाइसेंस सिस्टम

जब देश की आर्थिक हालत खस्ता हो चुकी थी, उस दौर में हुए सुधारों ने ही आगे के लिए मजबूत बुनियाद रखी। इन सुधारों के पीछे पीवी नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम की अहम भूमिका रही। जानिए 'इंपोर्ट लाइसेंस राज' खत्म होने की कहानी।
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Chidambaram
पूर्व वाणिज्य और वित्त मंत्री पी चिदंबरम (एजेंसी फ़ाइल फोटो)

साल 1991 में वह जुलाई का महीना था, जब भारत ने एक बड़ी क्रांति देखी थी। यह आर्थिक क्रांति उतनी ही अहम थी, जितनी 1947 में पंडित जवाहर लाल के नेतृत्व में हुई राजनीतिक क्रांति थी। इसके सूत्रधार थे प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव।

70 साल के राव ऐसे समय प्रधानमंत्री बने थे जब देश की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी। इसे देखते हुए उन्होंने वित्त मंत्रालय संभालने के लिए किसी नेता को नहीं, बल्कि विशेषज्ञ को चुना। वह विशेषज्ञ थे मनमोहन सिंह।

बंद कमरे में नरसिम्हा राव ने विपक्षी नेताओं को बताई भयावह स्थिति

21 जून, 1991 को नरसिम्हा राव का शपथ हुआ और अगले ही दिन उन्होंने ऐलान कर दिया कि देश संकट (आर्थिक) के दौर से गुजर रहा है। इससे उबरने के लिए कड़े सुधारों की जरूरत है। उन्होंने इन सुधारों को लागू करने के लिए संकट को एक अवसर के रूप में देखा।

प्रधानमंत्री ने बड़े विपक्षी नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक की। इसमें मनमोहन सिंह ने उन्हें हालात की गंभीरता बताई और कहा कि विदेशी मुद्रा भंडार केवल दो हफ्ते के आयात के लायक बचा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) से कर्ज लेने के अलावा कोई चारा नहीं है। लेकिन, इससे पहले हमें कुछ बुनियादी सुधार करने होंगे। उन्होंने बताया कि वह रुपये का अवमूल्यन करना चाहते हैं। उन्होंने सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कड़े कदमों के लिए विपक्ष का समर्थन मांगा। विपक्षी नेताओं को हालात की गंभीरता का अंदाज तभी लगा जब उन्हें पता चला कि आईएमएफ़ से 2.2 अरब डॉलर का कर्ज लेने के लिए लंदन में सोना गिरवी रखा गया है।

सरकार ने जुलाई के पहले तीन दिनों में दो बार रुपये का अवमूल्यन किया। दूसरी बार अवमूल्यन के बाद मनमोहन सिंह ने पी चिदंबरम (वाणिज्य मंत्री) और मोंटेक सिंह अहलूवालिया (वाणिज्य सचिव) से मुलाक़ात की। वित्त मंत्री ने उन्हें बताया कि निर्यातकों को दी जाने वाली सब्सिडी खत्म कर दी जाए तो वित्तीय घाटा 0.4 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

मनमोहन सिंह ने पी चिदम्बरम को दिया शाम सात बजे तक का वक्त

मनमोहन सिंह की यह बात सुनते ही चिदम्बरम को झटका लग गया। उनके मन में सबसे पहला ख्याल यही आया कि कुर्सी संभालते ही अगर निर्यात पर सब्सिडी बंद होने का फैसला आ जाता है तो यह राजनीतिक रूप से ख़ुदकुशी जैसा होगा। निर्यात बढ़ाने का सबसे कारगर हथियार सब्सिडी ही है और अगर यही खत्म हो गया तो निर्यातकों के सामने किस मुंह से जाएंगे! इस उधेड़बुन में फंसे चिदंबरम ने कहा, 'मुझे जरा सोचने दीजिए।' लेकिन, मनमोहन सिंह ने उनके लिए रास्ता नहीं छोड़ा था। उन्होंने वाणिज्य मंत्री से कहा, 'जरा जल्दी सोचिएगा, क्योंकि अगली सुबह प्रधानमंत्री को इस बारे में घोषणा करनी है। उन्हें शाम सात बजे तक का वक्त दिया गया।

चिदंबरम अपने दफ्तर उद्योग भवन वापस आए। उन्होंने मोंटेक सिंह अहलूवालिया को बुलाया और सीधा सवाल किया कि क्या वह कारोबार से लाइसेंस राज खत्म करने के लिए तैयार हैं? 40 साल से चले आ रहे लाइसेंस राज को खत्म करने के लिए उनके पास केवल आठ घंटे थे। वे जानते थे कि उन्हें मुख्य रूप से आयात के लिए दिए जाने वाले लाइसेंस की व्यवस्था खत्म करनी है। अगर लाइसेंस के बदले इंसेंटिव मिलने लग जाए तो निर्यातकों की सब्सिडी खत्म करने की भरपाई हो सकती है।

मोंटेक सिंह ने तुरंत निकाला रास्ता

मोंटेक सिंह के पास इसका उपाय पहले से मौजूद था। मंत्रालय में इससे जुड़ा एक प्रस्ताव धूल फांक रहा था। इसे एग्जिम स्क्रिप कहा गया। इसके तहत निर्यातकों को विदेश भेजने वाले सामान के एक हिस्से पर विदेशी मुद्रा कमाने का विकल्प दिया गया। वे इसे या तो सीधे बेच सकते थे या उसके एवज में विदेश से सामान मंगवा सकते थे। जो निर्यातक नहीं हैं या ऐसे घरेलू कारोबारी जिन्हें प्रॉडक्ट तैयार करने के लिए विदेश से मंगवाए सामान की जरूरत होती थी, वे आयात के लिए लाइसेंस का आवेदन देने के बजाय बाजार से एग्जिम स्क्रिप खरीद सकते थे।

गुरचरन दास अपनी किताब 'इंडिया बाउंड' में लिखते हैं कि चिदंबरम को यह तरीका अच्छा लगा। इसमें नौकरशाही, लालफ़ीताशाही, लेटलतीफी, भ्रष्टाचार सब खत्म होने की संभावना दिखाई दे रही थी। साथ ही, दुनिया को एक संदेश भी था कि भारत का बाजार सबके लिए खुल रहा है। शाम सात बजे से पहले यह प्रस्ताव पाकर मनमोहन सिंह भी बहुत खुश थे।

अब मनमोहन, चिदंबरम और अहलूवालिया पीएम के घर पहुंचे। नरसिम्हा राव लुंगी में थे। वह तुरंत नहा कर निकले थे और तरोताजा दिख रहे थे। चिदंबरम ने उनके बगल में बैठ कर अपना प्रस्ताव सुनाया। प्रस्ताव सुनने के बाद पीएम ने मनमोहन से पूछा, 'आपको ठीक लग रहा है?' उन्होंने हां में जवाब दिया। उनकी हां सुनते ही पीएम ने कहा, 'फिर कीजिए दस्तखत।'

मनमोहन सिंह ने दस्तखत किए। नीचे पीएम ने भी हस्ताक्षर किए। इसी के साथ भारतीय इतिहास के बड़े सुधारों में से एक का काम पूरा हुआ।

Updated on:
29 Jul 2026 04:56 pm
Published on:
29 Jul 2026 04:33 pm
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