दीक्षा या परिवार? सूरत में सात साल की बच्ची की दीक्षा पर कोर्ट की रोक के बाद जैन दंपती ने आपसी झगड़े भुलाकर साथ रहने का फैसला किया। एक साल के अलगाव के बाद कैसे हुआ इस परिवार का मिलन, देखिए पूरी रिपोर्ट।
अंत भला तो सब भला। सात साल की बेटी के भिक्षुणी दीक्षा की ओर बढ़ते कदमों ने एक साल से लड़-झगड़ कर अलग रह रहे जैन दंपती को फिर साथ ला दिया। समाज की मध्यस्थता और फैमिली कोर्ट की पहल से दोनों ने समझौता किया कि फिलहाल बेटी को भिक्षुणी नहीं बनाया जाएगा और भविष्य में वे ऐसा कोई निर्णय लेते हैं तो वह दोनों की सहमति से होगा।
दंपती ने साथ रहने, आपसी विवाद न करने और अदालतों से अर्जिया वापस लेने पर सहमति जताई। कोर्ट ने भी समझौते पर मुहर लगाते हुए याचिका का निपटारा कर दिया। बच्ची के पिता ने परिवार के पुनर्मिलन पर संतोष जताया, जबकि मां ने कहा कि बच्चों को पिता की आवश्यकता है और वे अब प्रेम व समझ के साथ-साथ रहेंगे। इसके साथ ही पिछले पखवाड़े बेटी की चर्चित प्रस्तावित दीक्षा को लेकर चला विवाद भी समाप्त हो गया। इससे पहले पिता की अर्जी पर कोर्ट ने 22 दिसंबर को दीक्षा पर रोक लगाई थी।
सूरत निवासी जैन दंपती का विवाह 2012 में हुआ था। उनके सात साल की बेटी और पांच साल का बेटा है। 2024 में मनमुटाव के चलते पत्नी बच्चों के साथ मायके चली गई। बाद में नाबालिग बेटी को एक साल के लिए एक जैन आध्यात्मिक गुरु की देखरेख में भेज दिया और सहमत हो गई कि बेटी चार फरवरी से मुंबई में हो रहे कार्यक्रम में संन्यासी जीवन में प्रवेश करेगी।
वॉट्सएप ग्रुप में साझा हुए दीक्षा निमंत्रण कार्ड से जानकारी मिलने पर पिता ने कोर्ट में आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि वे पत्नी-बच्चों का भरण-पोषण करने में सक्षम हैं और कोई व्यक्ति डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनकर भी समाज की सेवा कर सकता है। कोर्ट ने आपत्ति स्वीकार करते हुए दीक्षा पर रोक लगाई।