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अब तक कोई महिला सीजेआई नहीं, हाईकोर्ट के 781 जजों में से मात्र 116 महिलाएं

बीते वर्षों में हाईकोर्ट में 5161 जज बहाल हुए। इनमें महिलाएं 300 भी नहीं। अगले साल देश को मिलेगी पहली महिला सीजेआई।
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नई दिल्ली

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Vijay Kumar Jha

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Updated: 9 Mar 2026, 9:46 AM IST

Appointment of judges in Supreme court, NCERT Book Controversy

सुप्रीम कोर्ट में पहली महिला जज 1989 में नियुक्त की गईं। (फोटो: पत्रिका)

Supreme Court: जजों की नियुक्ति लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। मौजूदा कॉलेजियम हो या इससे पहले की कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति की व्यवस्था, जज तय करने के तरीकों, पैमानों पर हमेशा चर्चा होती रही है। इसके पैमानों में एक बात यह भी कही जाती रही है कि लिंग, क्षेत्र, धर्म, समुदाय आदि के आधार पर सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व रहे। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाता है।

क्यों नहीं हो पाता है, यह अलग चर्चा का विषय है। लेकिन सच यह है कि आज देश के 25 हाईकोर्ट के 781 जजों में से मात्र 116 महिलाएं हैं। यानि, करीब 15 प्रतिशत। हाईकोर्ट में बीते वर्षों में नियुक्त किए गए 5161 जजों में से मात्र 291 महिलाएं थीं। 6 फीसदी से भी कम!

सुप्रीम कोर्ट के 33 जजों में से सिर्फ एक महिला है। सुप्रीम कोर्ट में पहली महिला जज लाने में 40 साल लग गए थे। सितंबर 2021 के बाद सुप्रीम कोर्ट में किसी महिला जज की नियुक्ति नहीं हुई है। आज तक सुप्रीम कोर्ट में कोई महिला चीफ जस्टिस नहीं हुई हैं। दो हाई कोर्ट में इस समय जरूर महिला चीफ जस्टिस हैं। सुप्रीम कोर्ट में 24 सितंबर, 2027 को जस्टिस बीवी नागरत्ना पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनेंगी।

सीजेआई सूर्य कान्त ने 8 मार्च को एक कार्यक्रम में कहा कि न्यायपालिका में लैंगिक संतुलन का काम अभी अधूरा है। उन्होंने कहा कि इस दिशा में काम तेज करने के लिए जज चुनने का दायरा बढ़ाना होगा। उन्होंने हाई कोर्ट लेवल पर केवल उम्र के आधार पर जजों की दावेदारी नहीं खारिज करने की भी जरूरत बताई।

लेकिन, ऐसा क्यों हो रहा है? पूर्व सीजेआई एनवी रमना ने एक कार्यक्रम में कहा कि सरकार कॉलेजियम की सिफ़ारिशों में महिला जजों का नाम हो, इस बात पर कड़ाई से ज़ोर नहीं देती और न्यायपालिका को भी इस मसले पर ज्यादा संवेदनशील होना होगा।

असल में इस स्थिति की वजह समझने के लिए मसले को व्यावहारिक नजरिए से भी देखने की जरूरत है। इस नजरिए से देखने पर सिद्धान्त और व्यवहार का अंतर भी समझ में आएगा।

पिछले दिनों न्यायपालिका से जुड़ी दो खबरें आईं। एक में सुप्रीम कोर्ट के जज ने समाज में मौजूद एक बुराई की बात की और दूसरी में चीफ जस्टिस ने न्यायपालिका की बुराई किए जाने पर तल्ख टिप्पणी की। इन दोनों खबरों को न्यायपालिका से जुड़ी हकीकतों के पैमाने पर परखते हैं।

जस्टिस भुइयां ने समाज को दिखाया आईना

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस ऊज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि आजादी के 75 साल बाद भी देश में धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव जारी है। उन्होंने कहा कि संविधान के मुताबिक जिस नैतिकता की लोगों से अपेक्षा होती है, व्यवहार में उससे अलग दिखती है। उन्होंने समाज में गहरी विभाजन रेखा मौजूद होने का जिक्र किया और दो उदाहरण देकर बताया कि समाज में मुसलमानों और दलितों के प्रति भेदभाव होता है।

जस्टिस भुइयां ने एक उदाहरण अपनी बेटी की दोस्त (जो पीएचडी कर रही थी) का दिया, जिसे मुस्लिम होने के चलते दिल्ली की एक मकान मालकिन ने कमरा देने से मना कर दिया था। दूसरा उदाहरण, ओड़िशा का दिया, जहां मां-बाप ने अपने बच्चों को दलितों के हाथ का पका मिड-डे मील का खाना खाने से मना कर दिया था।

जस्टिस भुइयां 21 फरवरी को हैदराबाद में तेलंगाना जजेज असोशिएशन और द तेलंगाना स्टेट जुडीशियल अकादमी द्वारा आयोजित एक सेमिनार में बोल रहे थे।

सीजेआई बोले- न्यायपालिका को बदनाम नहीं होने देंगे

25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कान्त ने कहा कि वह संस्थान (न्यायपालिका) कि गरिमा गिराने और उसे बदनाम करने का हक किसी को नहीं देंगे और ऐसी किसी भी हरकत पर उचित एक्शन लेंगे। सीजेआई ने कोर्टरूम में एनईसीईआरटी की आठवीं की किताब (सोशल साइंस) में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ शीर्षक से कुछ बातें शामिल किए जाने की खबर के विरोध में यह बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए केस भी दर्ज किया। बाद में एनसीईआरटी ने खेद जताते हुए किताब वापस ले ली।

अब इन दोनों खबरों को न्यायपालिका से जुड़ी कुछ हकीकतों के मद्देनजर देखते हैं।

पहले जस्टिस भुइयां की बात पर आते हैं। उन्होंने जो उदाहरण दिए वे जाति या संप्रदाय के आधार पर मौका नहीं दिए जाने की श्रेणी में आते हैं। यह कानून और संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। लेकिन, समाज में अनेक ऐसे उदाहरण भी दिखाई देते हैं, जहां मौका दिए जाने का मुख्य आधार धर्म, जाति या संप्रदाय को बनाया जाता है। ऐसे कुछ उदाहरण सुप्रीम कोर्ट में भी मिल जाते हैं। हालांकि, इसके पीछे का मकसद यह होता है या होना चाहिए कि सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन जिस तरह से नियुक्ति के उदाहरण मिलते हैं, वह इस मकसद को साधने वाले नहीं लगते।

नामी वकील अभिनव चंद्रचूड़ ने अपनी किताब ‘द सुप्रीम व्हिसपर्स’ में कुछ ऐसे उदाहरणों का जिक्र किया है। इन उदाहरणों के बारे में जानते हैं।

सिख जज ही चाहिए- सुप्रीम कोर्ट के लिए खोजा गया सिख जज

चंद्रचूड़ ने लिखा है कि 1973 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से विशेष तौर पर मांग की गई कि सुप्रीम कोर्ट में एक सिख जज बहाल किया जाए। यह मांग करने के लिए पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह, तब के लोकसभा अध्यक्ष जीएस ढिल्लन और केन्द्रीय कानून मंत्री एचआर गोखले खास तौर पर प्रधानमंत्री से मिलने गए थे।

यह मांग मान भी ली गई और सिख जज खोजने के विशेष अभियान पर गोखले चंडीगढ़ गए थे। जैल सिंह ने एक सिख जज जस्टिस आरएस सरकारिया को चुना। उन्होंने पहले मना कर दिया। आखिरी समय में जब वह राजी हुए तो कानून मंत्री ने उनकी नियुक्ति कारवाई। (पूरा किस्सा यहां पढ़ें)।

जज चुनने में कई बार मुस्लिम होने को प्राथमिकता

चंद्रचूड़ ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट में लगभग हमेशा एक मुस्लिम जज रखा ही जाता रहा है और इसके लिए कई बार मुस्लिम होने को ही बड़ी प्राथमिकता दे दी जाती है। 1960 के दशक में एसजे इमाम को चीफ जस्टिस बनना था, लेकिन उनकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी। इस वजह से पंडित जवाहर लाल नेहरू चाह कर भी उन्हें चीफ जस्टिस नहीं बना सके। कहा जाता है, इस पर नेहरू को इस बात की चिंता सता रही थी कि पाकिस्तान को लग सकता है कि एक मुस्लिम जज की वरिष्ठता की अनदेखी हुई है।

इसी किताब में जस्टिस बीपी सिन्हा के हवाले से लिखा गया है कि जस्टिस गुलाम हसन बाकी समकक्ष जजों से योग्यता में कमतर थे, फिर भी मुसलमान होने के चलते उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज बनाया गया था।

दिसंबर, 1971 में आरएस पाठक के सीनियर होने के बावजूद जस्टिस एम हमीदुल्ला को जज बनाने की प्रमुख वजह भी उनका मुस्लिम होना ही बताया गया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस पीबी सावंत ने भी अपनी किताब 'जुडीशियल इंडिपेंडेंस: मिथ एंड रियलिटी' में है कि जजों की नियुक्ति में राजनीतिक दृष्टिकोण से भी चीजों को परखा जाता है। साथ ही, वर्ग, समुदाय, क्षेत्र आदि की भी अहम भूमिका रहती है।

जाति के आधार पर नियुक्त हुए जज

जाति के आधार पर नियुक्ति का कोई आधिकारिक प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन जस्टिस ए वरदराजन के मामले में यह साफ था। वह सुप्रीम कोर्ट में अनुसूचित जाति (एससी) के पहले जज थे। उनकी नियुक्ति के बारे में सीजेआई वाईवी चंद्रचूड़ और कानून मंत्री पी शिवशंकर ने माना था कि उनकी नियुक्ति में जाति एक आधार माना गया था, क्योंकि एससी वर्ग का कोई जज नहीं था।

लिखित नियम नहीं, पर बन गई है परंपरा

धर्म-जाति-समुदाय आदि के आधार पर नियुक्ति का कोई लिखित प्रावधान नहीं है, लेकिन न्यायपालिका में सभी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के मकसद से इसे किया जाता है। ऐसी नियुक्तियों के पीछे धार्मिक अल्पसंख्यकों या संबन्धित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की संविधान की मूल भावना का पालन करने का तर्क दिया जाता है। लेकिन ऐसा अक्सर हो नहीं पाता है। यह कितना संभव हो पाता है, इसे कुछ आंकड़ों से समझा जा सकता है।

भारत की न्यायपालिका पर गहन शोध करने वाले अमरिकी रिसर्चर और लेखक जॉर्ज गडबोईस के मुताबिक 1980 में देश के सभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 351 जजों में से 4.3 प्रतिशत मुस्लिम थे, जबकि 1988 में 400 में 6.8 प्रतिशत हो गए। 1 सितंबर, 2021 को इनकी हिस्सेदारी फिर कम हो गई और 4.5 प्रतिशत रह गई।

2023 के अंत में सुप्रीम कोर्ट में जो 33 जज थे, उनमें से 30 हिन्दू थे। बाकी तीन मुस्लिम, ईसाई और पारसी थे। सिख या बौद्ध में से कोई नहीं था। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में सिख 1.7 प्रतिशत, बौद्ध 0.7 प्रतिशत, जैन 0.4 और पारसी 0.06 प्रतिशत थे।

मुसलमानों की आबादी 14.2 प्रतिशत थी। 1950 से ही सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम जज रखने के परंपरा रही है। तब जजों की संख्या 8 थी। इनमें से 1 मुस्लिम रखने पर उनकी 12.5 फीसदी भागीदारी हो जाती थी। 1970 के दशक के अंत तक सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 16 और 2019 तक 34 हो गई थी। लेकिन, मुस्लिम जजों के संख्या अमूमन एक ही रखी गई।

2018 से 2024 के बीच जो बड़े जज नियुक्त (हायर जुडीशियरी में) हुए, उनमें से करीब 20 फीसदी एससी, एसटी और ओबीसी समुदाय के थे। महिलाएं 15 फीसदी और धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग के 5 फीसदी थे। सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं को तो 1989 तक एंट्री ही नहीं मिली। वहां पहली महिला जज (फातिमा बीवी) 1989 में बनाई गईं।

किताब वापस, पर सवाल कायम

अब ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ को स्कूली किताब में शामिल करने पर सीजेआई की टिप्पणी के संदर्भ में कुछ तथ्यों पर गौर करते हैं। एक अप्रैल, 2022 को तब के कानून मंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में बताया था कि एक जनवरी, 2017 से 31 दिसंबर, 2021 के बीच सरकार के पास न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और कामकाज से जुड़ी 1631 शिकायतें आईं। इन्हें सीजेआई और संबन्धित हाई कोर्ट्स के चीफ जस्टिस को भेज दिया गया। यह आंकड़ा भी किताब में शामिल है। हालांकि, एनसीईआरटी ने विवाद के बाद किताब वापस ले ली है। फिर भी, इन शिकायतों का क्या हुआ, जनता को यह भी पता चलना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कॉलेन गोंजालवेलिस ने कुछ समय पहले कहा था कि न्यायपालिका, खास कर सुप्रीम कोर्ट में भ्रष्टाचार की बातें कोर्ट के गलियारों में तो होती हैं, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं है और न हो सकता है, क्योंकि वहां भ्रष्टाचार को पकड़ने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। ऐसी व्यवस्था बने और अच्छी तरह से चले तो न्यायपालिका साख के संकट से उबर सकती है।