
जम्मू-कश्मीर के बारामूला से सांसद इंजीनियर राशिद उर्फ अब्दुल राशिद शेख की जमानत पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। टेरर फंडिंग से जुड़े मामले में करीब सात साल से जेल में बंद राशिद की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई।
इस दौरान राशिद के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश का हवाला दिया। वहीं, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उनकी जमानत का विरोध करते हुए भारत विरोधी गतिविधियों और गवाहों से संपर्क करने जैसे गंभीर आरोप लगाए।
बता दें कि यह मामला गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज है। राशिद को अगस्त 2019 में गिरफ्तार किया गया था। तब से वह न्यायिक हिरासत में हैं।
अब्दुल राशिद शेख की ओर से अदालत में दलील दी गई कि वह पिछले करीब सात वर्षों से जेल में बंद हैं। इतने लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद उन्हें अब तक राहत नहीं मिली है।
उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2026 के फैसले का भी हवाला दिया। उन्होंने बताया कि इसी मामले में समान आरोपों का सामना कर रहे एक अन्य आरोपी शब्बीर अहमद शाह को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी थी।
बचाव पक्ष का कहना था कि जब समान आरोपों का सामना कर रहे दूसरे आरोपी को जमानत मिल सकती है, तो राशिद के मामले में भी इस पहलू पर विचार किया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, NIA ने राशिद की जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। जांच एजेंसी ने अदालत में दलील दी कि राशिद ने भारत के खिलाफ भाषण दिए थे और भारत विरोधी गतिविधियों का समर्थन किया था।
एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि मामले के दो संरक्षित गवाहों को लेकर राशिद की भूमिका गंभीर है। NIA के मुताबिक, अंतरिम जमानत पर जेल से बाहर रहने के दौरान भी उन्होंने मामले के गवाहों से मुलाकात की थी।
जांच एजेंसी ने इन परिस्थितियों को आधार बनाते हुए कहा कि उन्हें जमानत देने से मामले की जांच और गवाहों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है। हालांकि, ये एजेंसी की ओर से अदालत में रखी गई दलीलें हैं।
अब्दुल राशिद शेख को टेरर फंडिंग से जुड़े मामले में अगस्त 2019 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर UAPA के तहत आरोप लगाए गए हैं। इस मामले में उनकी लंबी न्यायिक हिरासत और समान आरोपों वाले दूसरे आरोपी को मिली जमानत अब सुनवाई का अहम मुद्दा बन गई है।
फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जमानत याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की नजरें अदालत के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। फैसला आने के बाद ही साफ होगा कि करीब सात साल से जेल में बंद बारामूला सांसद को राहत मिलती है या उनकी हिरासत जारी रहती है।