1991 के लोकसभा चुनाव में अजित पवार ने बारामती सीट से जीत हासिल की थी। यह उनकी पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी। उसी समय केंद्र में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार बनी।
अजित पवार के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत पर चर्चा तेज हो गई है। 1991 का एक ऐसा घटनाक्रम अब फिर याद किया जा रहा है, जब युवा अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के डिफेंस मिनिस्टर पद को बचाने के लिए अपनी लोकसभा सीट छोड़ दी थी। यह घटना पवार परिवार की एकजुटता और रणनीतिक सोच का बेहतरीन उदाहरण मानी जाती है।
1991 के लोकसभा चुनाव में अजित पवार ने बारामती सीट से जीत हासिल की थी। यह उनकी पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी। उसी समय केंद्र में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार बनी। शरद पवार को डिफेंस मिनिस्टर बनाया गया, लेकिन संविधान के अनुसार, मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए सांसद होना जरूरी था। शरद पवार उस समय राज्यसभा सदस्य थे, लेकिन डिफेंस जैसे महत्वपूर्ण विभाग के लिए लोकसभा सीट की आवश्यकता थी।
कांग्रेस हाईकमान और शरद पवार ने फैसला किया कि बारामती सीट से उपचुनाव कराकर शरद पवार को लोकसभा में भेजा जाए। लेकिन अजित पवार ने इसे स्वीकार कर लिया और अपनी नई-नई जीती सीट त्याग दी। उपचुनाव में शरद पवार ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और डिफेंस मिनिस्टर बने रहे। इस 'सीट स्वैप' से शरद पवार का मंत्री पद बच गया और पवार परिवार की साख मजबूत हुई।
यह फैसला उस समय अजित पवार के लिए आसान नहीं था। वे युवा थे, पहली बार सांसद बने थे, लेकिन परिवार और पार्टी के हित में उन्होंने कुर्बानी दी। इस घटना ने अजित पवार को पार्टी में एक जिम्मेदार और वफादार नेता के रूप में स्थापित किया। बाद में अजित पवार ने कई बार कहा कि परिवार और पार्टी के लिए व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठना जरूरी है।
1991 का यह मास्टरस्ट्रोक आज अजित पवार की मौत के बाद फिर चर्चा में है। पवार परिवार की राजनीति में एकजुटता और रणनीतिक निर्णय लेने की क्षमता हमेशा से रही है। शरद पवार और अजित पवार के बीच मतभेदों के बावजूद, ऐसे मौकों पर परिवार ने एक साथ खड़े होने का संदेश दिया। यह घटना बारामती की राजनीतिक विरासत का हिस्सा बन गई, जहां से पवार परिवार ने दशकों तक महाराष्ट्र और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया।