
Congress comeback: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान ने कांग्रेस और भाजपा के बीच सियासी बयानबाजी को फिर तेज कर दिया है। कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने शाह पर निशाना साधते हुए इसे अपनी पार्टी की राजनीतिक सक्रियता का संकेत बताया। उन्होंने अतीत के चुनावी आंकड़ों और संसद में भाजपा की पुरानी स्थिति का जिक्र कर दावा किया कि कांग्रेस दोबारा मजबूती हासिल कर रही है। तिवारी ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में भविष्य की चुनावी संभावनाओं को लेकर भी बड़ा सियासी दावा किया।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि लंबे समय तक खामोश रहने के बाद शाह का सामने आकर बयान देना उनकी पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि है। तिवारी के मुताबिक, कांग्रेस की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता ने भाजपा नेतृत्व को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया है।
तिवारी ने अपने बयान में वर्ष 1985 की यादें साझा करते हुए कहा कि उन्होंने संसद में भाजपा के महज दो सांसदों को अपनी आंखों से देखा था। उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उस दौर में भाजपा की सीमित संख्या का जिक्र किया। कांग्रेस सांसद का यह तर्क था कि भारतीय राजनीति में किसी दल की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। समय, नेतृत्व, जनसंपर्क और चुनावी परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक समीकरण बदलते रहते हैं।
प्रमोद तिवारी ने कहा कि कांग्रेस फिर से राजनीतिक वापसी की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने अपनी पार्टी के चार राज्यों में मौजूदगी का उल्लेख करते हुए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में कांग्रेस के नेतृत्व में तिरंगा लहराने की उम्मीद जताई।
आपको बता दें की गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा। शाह ने दावा किया कि गुजरात में कांग्रेस को 1985 के बाद किसी चुनाव में जीत नहीं मिली। उन्होंने चुनावी नतीजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति जनता के समर्थन से जोड़ते हुए विपक्ष की चुनावी रणनीति पर भी सवाल उठाए।
उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब की राजनीति में अलग-अलग सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की समस्याएं, विकास और शासन का रिकॉर्ड मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में नेताओं के दावों के साथ-साथ जमीनी संगठन और जनसमर्थन भी निर्णायक होंगे।