
Andhra Pradesh Alliance News: आंध्र प्रदेश की सत्ता में फिलहाल एनडीए सरकार मजबूत दिख रही है, लेकिन गठबंधन के भीतर सब कुछ सहज है या नहीं, इस पर सवाल उठने लगे हैं। डिप्टी सीएम और जनसेना प्रमुख पवन कल्याण की लगातार गैरमौजूदगी ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। खासकर जब वह कुछ ऐसे सरकारी कार्यक्रमों से दूर रहे, जहां मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू मौजूद थे। ऐसे में बीमारी की वजह और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की रणनीति दोनों को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।
चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, जनसेना और बीजेपी के गठबंधन ने 2024 के चुनाव में शानदार सफलता हासिल की थी। सत्ता में आने के बाद भी यह गठजोड़ अब तक कायम है। इसके बावजूद पवन कल्याण की हालिया गैरमौजूदगी ने राजनीतिक हलकों में चर्चा को जन्म दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार पवन कम से कम चार कैबिनेट बैठकों में शामिल नहीं हुए। 18 अगस्त की बैठक में भी उनकी अनुपस्थिति रही। विधानसभा सत्र से दूरी ने भी सवाल बढ़ाए। हालांकि जनसेना विधायक दल की बैठक में उनकी मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि वे पूरी तरह राजनीतिक गतिविधियों से अलग नहीं हैं।
13 अगस्त की घटना ने अटकलों को और तेज किया। चंद्रबाबू नायडू अमरावती में सीड एक्सेस रोड फेज-2 और स्टील ब्रिज से जुड़े कार्यक्रम में मौजूद थे, लेकिन पवन कल्याण वहां नहीं पहुंचे। उसी दिन वह विशाखापत्तनम में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ राष्ट्रीय हाथी दिवस कार्यक्रम में नजर आए।
जनसेना का कहना है कि लंबे समय तक चलने वाली कैबिनेट बैठकों में शामिल होना उनकी मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति में कठिन है। जुलाई में मुंबई में उनके दाहिने कंधे की सर्जरी हुई थी। दोनों कंधों में रोटेटर कफ की गंभीर चोट और दाहिने कंधे में फ्रैक्चर की समस्या बताई गई थी। इसके बाद आराम और फिजियोथेरेपी की सलाह दी गई।
स्वास्थ्य कारणों के साथ अब सीट बंटवारे का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है। जनसेना के वरिष्ठ नेता नादेंदला मनोहर पहले ही संकेत दे चुके हैं कि 2024 में तय हुआ सीट बंटवारा स्थानीय निकाय चुनाव में अपने आप लागू नहीं होगा।
इसका सीधा मतलब है कि जनसेना उन क्षेत्रों में ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है, जहां उसका संगठन और कार्यकर्ता आधार मजबूत है। पार्टी के लिए यह मांग इसलिए अहम है क्योंकि सत्ता में आने के बाद वह अपने राजनीतिक प्रभाव को जमीनी स्तर पर विस्तार देना चाहती है।
टी़डीपी के सामने भी चुनौती कम नहीं है। ज्यादा सीटें छोड़ने पर उसके स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष पैदा हो सकता है। वहीं जनसेना को कम हिस्सेदारी मिलने पर गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन का सवाल उठ सकता है।
फिलहाल पवन कल्याण और चंद्रबाबू नायडू के बीच किसी खुले टकराव की पुष्टि नहीं हुई है। स्वास्थ्य उनकी अनुपस्थिति की वास्तविक वजह है और जनसेना ने भी गठबंधन से अलग होने जैसा कोई संकेत नहीं दिया है।
लेकिन स्थानीय चुनावों का सीट गणित इस रिश्ते की अगली बड़ी परीक्षा जरूर बन सकता है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तुलना में पंचायत, नगरपालिका और वार्ड स्तर पर स्थानीय समीकरण ज्यादा पेचीदा होते हैं।
अब असली नजर इस बात पर है कि सीट बंटवारे में जनसेना को कितना स्थान मिलता है और क्या पवन कल्याण जल्द ही नायडू के साथ बड़े सरकारी मंचों पर फिर सक्रिय नजर आते हैं। यही दो संकेत तय करेंगे कि मौजूदा दूरी महज स्वास्थ्य संबंधी है या गठबंधन के भीतर नई राजनीतिक बातचीत की शुरुआत हो चुकी है।