
Dharmendra Pradhan Resignation: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सोशल एक्टिविस्ट अन्ना हजारे हिंसा न करने की सलाह दी है। महाराष्ट्र के अहिल्यानगर में उन्होंने कहा कि अपने जीवन में उन्होंने 22 भूख हड़ताल की हैं लेकिन कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया। अन्ना हजारे ने कहा कि उनके आंदोलनों के बाद 10 कानून बने और यही साबित करता है कि बदलाव के लिए हिंसा नहीं बल्कि शांतिपूर्ण संघर्ष सबसे प्रभावी रास्ता है। उन्होंने युवाओं से भी अपील की कि वे किसी भी परिस्थिति में हिंसा का रास्ता न अपनाएं और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखें।
इसके बाद अन्ना हजारे ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा यह लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं। जो भी होना चाहिए वह लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए और हमें हमेशा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। अन्ना हजारे ने कहा कि किसी भी आंदोलन या विरोध में लोकतांत्रिक मूल्यों और अहिंसा का पालन सबसे महत्वपूर्ण है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। स्वराज पार्टी के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने इसे लोकतंत्र और जनता की जीत बताया है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत देश के युवा रहे जिन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी और बदलाव का रास्ता दिखाया।
योगेंद्र यादव ने यह भी कहा कि आंदोलन ने अपना एक अहम लक्ष्य हासिल कर लिया है, लेकिन अभी कुछ मुद्दों पर कार्रवाई बाकी है। उनके मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई की जवाबदेही तय होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आंदोलन में शामिल किसी भी छात्र के खिलाफ आगे कोई मामला दर्ज न हो।
असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा उन सभी छात्रों और युवाओं की जीत है जिन्होंने पिछले कई दिनों से इस मुद्दे को लेकर लगातार आवाज उठाई। मैं उन्हें बधाई देता हूं। इसके साथ ही उन्होंने मोदी सरकार पर भी जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा इस आंदोलन ने सरकार को खुला पैगाम दे दिया है कि अब तानाशाही नहीं चलेगी।
अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष अलका लांबा ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ उन छात्रों को भी याद किया जाना चाहिए जिन्होंने नीट यूजी 2026 पेपर लीक विवाद के बाद अपनी जान गंवाई। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने शुरुआत में ही प्रभावी कदम उठाए होते तो कई परिवारों को यह दुख नहीं झेलना पड़ता।
अलका लांबा ने कहा कि यह घटनाक्रम सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन छात्रों के संघर्ष और उनके परिवारों की पीड़ा की भी याद दिलाता है। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा पैदा न हों और कोई भी छात्र निराश होकर अपनी जान गंवाने को मजबूर न हो इसके लिए परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है।
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