
Assam Floods 2026: असम भयानक बाढ़ की चपेट में है। कई लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 3 लाख से अधिक लोग अब भी बाढ़ की चपेट में बताए जा रहे हैं। वैसे असम और बाढ़ का रिश्ता कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार हालात ज्यादा खराब हैं। सबसे ज्यादा प्रभावित तीन जिलों (ऊपरी असम के शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट) में रहने वालों का कहना है कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी।
बाढ़ में अब तक मरने वालों की संख्या 78 के पार पहुंच गई है। लेकिन ये आंकड़ा और बढ़ सकता है, क्योंकि तबाही की असल तस्वीर सामने आना बाकी है। डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को राहत शिविर में रखा गया है। स्थानीय प्रशासन तमाम एजेंसियों के साथ मिलकर लगातार नाव के ज़रिए बाढ़ प्रभावित इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकाल रहा है। हालांकि, बताया जा रहा है कि तमाम प्रयासों के बावजूद सरकार अभी भी शिवसागर जिले के नज़ीरा विधानसभा क्षेत्र के लगभग 30% और शिवसागर विधानसभा क्षेत्र के करीब 20% इलाकों तक नहीं पहुंच पाई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बाढ़ का पानी कम होने से कई फीट ऊंची मिट्टी की परतें बन गई हैं, जिससे इन इलाकों में पैदल या गाड़ी से पहुंचना मुश्किल है।
असम में बाढ़ के लिए ब्रह्मपुत्र नदी को दोषी ठहराया जाता है। ब्रह्मपुत्र तिब्बत से निकलती है और अरुणाचल प्रदेश होते हुए असम पहुंचती है। यहां ये मानस, सुबनसिरी और कोपिली जैसी 50 से अधिक सहायक नदियां इससे मिलती है। हालांकि, असम में भारी तबाही के लिए अकेले ब्रह्मपुत्र ही दोषी नहीं है, इसके दूसरे भी कुछ कारण हैं।
असम सरकार ने शुरुआत में बाढ़ की वजह 19 जुलाई को नागालैंड के पड़ोसी पहाड़ी जिले मोन में बादल फटना बताई थी। उसका कहना था कि भारी बारिश से नदियों का जलस्तर अभूतपूर्व तेजी से बढ़ा, जिससे निपटना चुनौती बन गया। ब्रह्मपुत्र नदी का जलस्तर पहले से ही बढ़ा हुआ है, ऐसे में सहायक नदियों के उफान पर आने से स्थिति बिगड़ गई।
हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कोहिमा के मौसम विज्ञान केंद्र के एक वैज्ञानिक के हवाले से बताया गया है कि उस इलाके में बादल फटने की घटना नहीं हुई थी - जिसे मौसम विज्ञान विभाग एक घंटे में 100 मिमी से अधिक बारिश के तौर पर परिभाषित करता है - बल्कि उस दिन आठ से नौ घंटों के दौरान 137 मिमी भारी बारिश हुई। इस वजह से कई जगह लैंडस्लाइड की घटनाएं भी हुईं, जिनमें नौ लोगों की मौत हो गई।
एक्स्पर्ट्स का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के चलते एक ही दिन में 50 मिमी या 100 मिमी से अधिक बारिश की घटनाएं अब ज्यादा देखने में आ रही हैं और आने वाले सालों में हालात बदतर हो सकते हैं। गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में भूगोल के प्रोफ़ेसर ध्रुवज्योति सहारिया का कहना है कि बाढ़ के लिए बारिश और इंसानी गतिविधियों, दोनों जिम्मेदार हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में हमने पाया है कि जहां से नदियां नीचे की तरफ आती हैं, वहां किनारों पर काफी खुदाई हुई है। शायद इसकी वजह माइनिंग है। अत्यधिक खुदाई के चलते बड़े पैमाने पर मिट्टी नीचे बहकर आती है, जो स्थिति को खराब कर देती है। दरअसल, नदी की तलहटी में गाद यानी मिट्टी या मलबा जमने से नदी का तल उथला हो जाता है, जिससे उसकी जल-धारण क्षमता कम हो जाती है। इसके चलते थोड़े से पानी में ही नदियां उफान पर आ जाती हैं और आसपास के इलाकों में बाढ़ आ जाती है।
IIT रुड़की के रिटायर्ड प्रोफेसर नयन शर्मा का मानना है कि इसके पीछे कई वजहें हैं, जिनमें से एक है पेड़ों की कटाई यानी डिफ़ॉरेस्टेशन। अपनी बात को समझाते हुए उन्होंने कहा कि जहां घने जंगल होते हैं, वहां भारी बारिश के दौरान इनफिल्ट्रेशन अपॉर्चुनिटी टाइम बढ़ जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो पानी को ज़मीन के अंदर रिसने अधिक समय मिलता है। लेकिन अगर जमीन बंजर, पेड़ लगातार काम होते जा रहे हों, तो इसके लिए पर्याप्त समय नहीं मिलता और पानी तेजी से ढलान की ओर बहता है, साथ ही अपने साथ बहुत सारी गाद भी ले जाता है। जंगल के तेजी से कम होने की वजह से हम यही स्थिति देख रहे हैं। यह अतिरिक्त गाद नदी की तलहटी को ऊपर उठा देती है और उसकी पानी स्टोर करने की क्षमता कम कर देती है। उन्होंने कहा कि हमें वॉटरशेड इलाकों (ढलान वाले हिस्से) में 100% वन रोपड़ के साथ ही ग्लोबल प्रेसिपिटेशन मॉनिटरिंग सिस्टम के इस्तेमाल से बेहतर पूर्वानुमान पर ध्यान केंद्रित करना होगा।