
India Indonesia Missile Deal: पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया के बीच हुए नए रक्षा समझौते ने एशिया की सामरिक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस पहल से भारत के महत्वपूर्ण रक्षा निर्यात सौदों पर कोई असर पड़ेगा? खासकर इंडोनेशिया को ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल बेचने के लिए हुए करार को लेकर चर्चाएं तेज हैं। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अपने हितों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान किए हैं।
चार देशों की नई रक्षा पहल के बीच भारत की मिसाइल कूटनीति पर निगाहें टिकी हैं। लेकिन क्या यह समझौता वास्तव में नई दिल्ली की रणनीतिक बढ़त को चुनौती दे सकता है, या फिर आशंकाएं हकीकत से दूर हैं?
पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया ने बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में ‘बद्र मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य सैन्य उत्पादन, तकनीकी प्रशिक्षण, अनुसंधान एवं विकास तथा रक्षा क्षमताओं को बढ़ावा देना है। तुर्किये के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, इस पहल के जरिए सदस्य देश अपनी औद्योगिक विशेषज्ञता का इस्तेमाल कर रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ाएंगे और मित्र देशों की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करेंगे।
इस घटनाक्रम के बीच भारत और इंडोनेशिया के बीच जुलाई में हुए करीब 630 मिलियन डॉलर के दो प्रमुख रक्षा समझौते चर्चा में हैं। इनके तहत इंडोनेशिया को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों की आपूर्ति की जानी है। चिंता यह जताई जा रही थी कि नए बहुपक्षीय समझौते के कारण भारतीय रक्षा तकनीक किसी अन्य देश तक पहुंचने का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के मानद अध्यक्ष और ब्रह्मोस एयरोस्पेस के पूर्व प्रमुख सुधीर कुमार मिश्रा ने द टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बातचीत में इन आशंकाओं को खारिज किया। उनके मुताबिक, भारत ने समझौतों में जरूरी सुरक्षा उपाय शामिल किए हैं। इंडोनेशिया को हथियारों के इस्तेमाल से जुड़ी निर्देश-पुस्तिका दी जाएगी, लेकिन तकनीक हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेज नहीं।
मिश्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और रक्षा संप्रभुता से जुड़ी शर्तें भारतीय तकनीक की हिफाजत करती हैं। इसलिए ब्रह्मोस और अस्त्र की संवेदनशील तकनीक प्रतिद्वंद्वी देशों तक पहुंचने की आशंका को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है।
सेंटर फॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज के वरिष्ठ फेलो और सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत ने भी इस समझौते को भारत के लिए तत्काल खतरा मानने से इनकार किया। उनके अनुसार, किसी समझौता ज्ञापन को सैन्य गठबंधन के बराबर नहीं माना जा सकता। बद्र MoU का स्वरूप रक्षा उत्पादन में काम के बंटवारे और अनुसंधान सहयोग की व्यवस्था जैसा दिखाई देता है।
अहलावत ने कहा कि मिसाइलों की आपूर्ति का मतलब उनकी पूरी तकनीक साझा करना नहीं है। इन हथियारों के संचालन, रखरखाव और सेवा-अवधि बढ़ाने के लिए इंडोनेशिया को भारतीय मूल उपकरण निर्माता (OEM) की सहायता की जरूरत रहेगी।