
Bal Thackeray Shiv Sena History:महाराष्ट्र की राजनीति को ‘मराठी मानुस’ के इर्द-गिर्द घूमने को विवश करने वाले बाल ठाकरे का कॉन्फिडेंस गजब था। शिवसेना के शुरुआती दिनों में वह इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे कि पार्टी कुछ बड़ा करेगी, न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनायेगी। ठाकरे का यह विश्वास रंग लाया, शिवसेना ‘हिंदुत्व’ के रथ पर सवार होकर असंख्य हिंदुओं की पसंदीदा पार्टी बनी। महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी धमक कायम की, लेकिन वक्त के साथ-साथ सबकुछ बदल गया। पहले नाराज राज ठाकरे अलग हुए, नई पार्टी - MNS – बनाई। बाल ठाकरे के निधन के बाद हालात और बिगड़े, शिवसेना में टूट हुई। एकनाथ शिंदे शिवसेना का आधिकारिक चुनाव चिन्ह ‘धनुष और बाण’ लेकर अलग हो गए। उद्धव अपने ही पिता की बनाई पार्टी को दूसरे के हाथों में जाते देखते रहे, कुछ न कर पाए। उन्होंने ‘मशाल’ चुनाव चिन्ह के साथ शिवसेना (UBT) बनाई, लेकिन बिगड़ चुके हालात नहीं बदले। यह पार्टी हर रोज टूट रही है और पूरी तरह बिखरने की कगार पर पहुंच गई है। दोनों भाई यानी उद्धव और राज भले ही साथ आ गए हों, लेकिन बाल ठाकरे वाला कॉन्फिडेंस नदारद है।
बाल ठाकरे का जोश और कॉन्फिडेंस कितना हाई रहता था, यह 1966 की एक घटना से समझा जा सकता है। शिवसेना को अस्तित्व में आए महज कुछ महीने ही हुए थे। ठाकरे के समर्थक उत्साहित थे, लेकिन कहीं न कहीं ये आशंका भी थी कि जिस पब्लिक के लिए सबकुछ कर रहे हैं क्या उसका साथ मिलेगा। इस ‘साथ’ की अग्निपरीक्षा का दिन आया– शिवसेना की रैली। बाल ठाकरे ने रैली के लिए दादर का शिवाजी पार्क मैदान चुना। कारीबियों को ठाकरे का यह फैसला समझ नहीं आया। शिवसेना के वरिष्ठ नेता सुभाष देसाई, जो इस रैली में मौजूद थे, ने 'इंडियन एक्सप्रेस' को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि ठाकरे को कोई छोटी जगह चुनने की सलाह दी गई थी। शिवसेना की स्थापना महज चार महीने हुए थे, तब एक नया और अनजाना राजनीतिक संगठन था। दादर का शिवाजी पार्क काफी बड़ा मैदान था, और इसकी कोई गारंटी नहीं थी कि रैली में इतनी भीड़ जुटेगी कि पूरा मैदान भर जाए। लेकिन ठाकरे ने जगह बदलने से इनकार कर दिया। उन्हें पूरा कॉन्फिडेंस था कि रैली हिट रहेगी और भारी संख्या में लोग पहुंचेंगे।
30 अक्टूबर 1966 – रैली वाले दिन वही हुआ जैसा बाल ठाकरे ने कहा था। इतनी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे कि बड़ा दिखाई दे रहा शिवाजी पार्क भी छोटा पड़ गया, खुद आयोजक भी हैरान रह गए। बाल ठाकरे उस समय मुख्य रूप से एक कार्टूनिस्ट और मराठी साप्ताहिक 'मार्मिक' के संपादक के रूप में जाने जाते थे। वह एक शर्ट और फॉर्मल पैंट पहनकर रैली में पहुंचे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि आसपास के जिम संचालक खुद क्राउड कंट्रोल करने पहुंच गए। शिवसेना नई पार्टी थी और आगे बढ़ने के लिए उसे आर्थिक सहायता चाहिए थी। ऐसे में रैली में चन्दा जुटाने का फैसला लिया गया। स्टील का टिफिन बॉक्स थामे पार्टी कार्यकर्ता लोगों के बीच घूमता और लोग उसमें कुछ न कुछ पैसे डाल देते। आयोजन स्थल पर न तो कोई भव्य मंच था और न ही सुरक्षा का वह भारी-भरकम इंतजाम। यह रैली उस संगठन की पहली सार्वजनिक परीक्षा थी, जिसने महाराष्ट्र, खासकर बॉम्बे में मराठी भाषियों के अधिकारों को सबसे पहले रखा। इसने एक ऐसी राजनीतिक परंपरा की नींव भी रखी, जो छह दशक बाद भी मुंबई में हजारों समर्थकों को अपनी ओर खींचती है।
इस रैली की तैयारी के दौरान चॉल और दोस्तों के घरों में छोटी-छोटी बैठकें की गईं। लोकल जिम और मोहल्लों के क्लबों ने समर्थकों को एकजुट करने में मदद की। यही नेटवर्क आगे चलकर सेना की 'शाखा' प्रणाली का मुख्य आधार बने, जिसके जरिए पार्टी ने मुंबई के अलग-अलग मोहल्लों में अपनी पैठ बनाई। रैली में बार-बार तालियां बजतीं और ज़िंदाबाद के नारे लगते। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली वर्तमान महाराष्ट्र सरकार के मंत्री छगन भुजबल उन दिनों वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट से पढ़ाई कर रहे थे और रैली में मौजूद थे। उन्होंने बताया था कि वे रैली में जुटी भीड़ को देखकर हैरान रह गए थे। रैली को संबोधित करने वालों में बाल ठाकरे के पिता केशव सीताराम ठाकरे भी शामिल थे, जिन्हें 'प्रबोधनकार' के नाम से अधिक जाना जाता है। कांग्रेस नेता रामराव आदिक और अन्य हस्तियों ने भी सभा को संबोधित किया। प्रबोधंकर ने सभा में कहा कि मैं अपने बेटे को महाराष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित कर रहा हूं। बाल ठाकरे इस सभा के आखिरी वक्ता थे। इस रैली ने उन्हें 'मार्मिक' के पाठकों के दायरे से बाहर एक मंच दिया और शिवाजी पार्क को शिवसेना के वार्षिक राजनीतिक संबोधन के केंद्र के रूप में स्थापित कर दिया। तब से हर साल दशहरे के दिन पार्टी लीडर यहां से अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हैं। इस 20 अक्टूबर को में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने महायुति सरकार पर प्रहार किया। वहीं, गोरेगांव के नेस्को सेंटर में आयोजित शिवसेना (शिंदे गुट) की दशहरा रैली में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे सहित सम्पूर्ण पर हमला बोला। यानी वार्षिक आयोजन की परंपरा का फिर निर्वहन हुआ, लेकिन दो अलग-अलग जगह और अलग-अलग चेहरों के साथ।
30 अक्टूबर 1966 के रैली में उमड़ी भीड़ देखकर स्थापित नेताओं को अपना सिंहासन हिलता दिखाई दिया। इस रैली को बदनाम करने की कोशिशें भी हुईं। अगले दिन अखबारों में खबर छपी - सभा के अंत में, भीड़ के कुछ उग्र सदस्यों ने उडुपी होटलों पर पथराव किया। मद्रासियों को बाहर निकालो और इडली-सांभर पर रोक लगाने जैसे नारे लगाए गए। बाद के वर्षों में भी इस तरह के आरोपों का सिलसिला चलता रहा। गैर-मराठियों के खिलाफ शिवसेना ने अभियान भी चलाए। हालांकि, बाद में शिवसेना ने सबको साथ लेकर चलने की नीति अपनाई। उद्धव ठाकरे ने भाषा के नाम पर हिंसा का समर्थन नहीं किया। राज ठाकरे जरूर हिंसा को हथियार बनाते रहे, लेकिन इसका उन्हें कोई फायदा नहीं मिला। उल्टा जो थोड़ी बहुत राजनीतिक जमीन थी, वो भी पैरों के नीचे से निकल गई। शिवसेना अब दो भागों में विभाजित है – एकनाथ शिंदे जुट ज्यादा मजबूत है। उद्धव गट हर रोज कमजोर हो रहा है। बाल ठाकरे का वो कॉन्फिडेंस जो राख में भी आग पैदा करने का माद्दा रखता था – अब पार्टी नेताओं में से नदारद है।