Lynching: बांग्लादेश के मयमनसिंह में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा हत्या और जलाने की घटना ने भारत में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। कोलकाता में शुवेंदु अधिकारी और असम के संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन कर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की है।
Bangladesh Hindu Lynchings: बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की आग थमने का नाम नहीं ले रही है। हाल ही में एक हिंदू युवक दीपू चंद्र दास (Dipu Chandra Das) की बर्बरता से की गई हत्या (Bangladesh Hindu Murder) से भारत में भारी आक्रोश पैदा हो गया है। इस मामले में सोमवार को कोलकाता से लेकर असम की गलियों तक विरोध की गूंज सुनाई दी। राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन और साधु-संत एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ न्याय की मांग कर रहे हैं। यह घटना 18 दिसंबर की है। बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले के भालुका इलाके में दीपू चंद्र दास नामक एक कपड़ा मजदूर को निशाना बनाया गया। भीड़ ने उन पर धर्म का अपमान करने का निराधार आरोप लगाया और इसके बाद उन्हें पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया (Bangladesh Hindu Lynchings)। क्रूरता की हदें तब पार हो गईं, जब उन्हें जिंदा जला दिया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भारतीय जनमानस में गहरा दुख और गुस्सा देखा जा रहा है।
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भाजपा नेता शुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में साधु-संतों ने एक विशाल जुलूस निकाला। यह जुलूस बांग्लादेश दूतावास की ओर बढ़ रहा था, लेकिन पुलिस ने इसे पार्क सर्कस के पास रोक दिया। इसके विरोध में अधिकारी और संत सड़क पर ही धरने पर बैठ गए।
असम में 'बंगाली परिषद' ने राज्य के 50 से अधिक स्थानों पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के पुतले फूंके और मांग की कि भारत सरकार इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाए।
बांग्लादेश के मौजूदा हालात: शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। कट्टरपंथी तत्व अल्पसंख्यकों के घर, मंदिर और अब उनके जीवन को निशाना बना रहे हैं। वहां कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नजर नहीं आ रही है।
मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस ने शांति की अपील तो की है, लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिख रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यूनुस प्रशासन दंगाइयों पर नकेल कसने में पूरी तरह विफल रहा है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
देश छोड़ कर भारत में शरण लेने वाली पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इन घटनाओं को अपनी सरकार गिराने की साजिश का हिस्सा मानती रही हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि उनके जाने के बाद ही देश में सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा मिल गया है।
भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त की है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि बांग्लादेश सरकार को अपने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। कूटनीतिक स्तर पर बांग्लादेश पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह मानवाधिकारों की रक्षा करे।
इस घटना पर आम लोगों और विचारकों की कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। सोशल मीडिया पर लोग इसे "मानवता की हत्या" करार दे रहे हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि यदि पड़ोसी देश में हमारे भाइयों पर अत्याचार नहीं रुका, तो सीमा पर व्यापार और अन्य संबंधों पर इसका असर पड़ना तय है।
भारत और विशेषकर बंगाल में विरोध की यह लहर अभी थमने वाली नहीं है। शुवेंदु अधिकारी ने घोषणा की है कि 24 दिसंबर को बांग्लादेश से सटी विभिन्न सीमाओं पर 'प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन' किया जाएगा। इसके अलावा, 26 दिसंबर को फिर से बांग्लादेश दूतावास का घेराव करने की योजना है। मंगलवार को भी कोलकाता में कई बड़े विरोध कार्यक्रम प्रस्तावित हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि जहां एक तरफ राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम नागरिक भी अब इस मुद्दे पर जागरूक हो रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस बार 'बंगाली अस्मिता' और 'हिंदू सुरक्षा' के नाम पर बंगाल और असम के लोग एक ही सुर में बात कर रहे हैं, जो आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।