
किसी महिला की तस्वीरें या उसकी LinkedIn प्रोफाइल देखकर यह नहीं माना जा सकता कि वह नौकरी करती है या आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और उसे गुजारा भत्ते की जरूरत नहीं है। बेंगलुरु की एक अदालत ने वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में यह टिप्पणी की है।
साथ ही कोर्ट ने दोनों पक्ष की दलीलों को सुनने के बाद साफ कहा कि महिला के नौकरी करने की संभावना या उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने पति की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पत्नी के निजी कंपनी में काम करने का दावा करते हुए आर्थिक मदद देने की जरूरत नहीं होने की बात कही थी। इस मामले में कोर्ट ने पति को झटका देते हुए पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया है।
अतिरिक्त सिटी सिविल एंड सेशंस जज मोहन प्रभु ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पति की ओर से दलील के समय कुछ तस्वीरें, LinkedIn प्रोफाइल और Facebook प्रोफाइल की तस्वीरें पेश की गई थीं। इनके आधार पर दावा किया गया कि महिला नौकरी कर रही है।
अदालत ने कहा कि इन दस्तावेजों से महिला की वास्तविक कमाई साबित नहीं होती। पति यह बताने में भी नाकाम रहा कि उसकी पत्नी कितनी रकम कमाती है।
कोर्ट ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि महिला ने कोई नौकरी शुरू कर दी है, तब भी सिर्फ इससे यह साबित नहीं होता कि उसकी आमदनी इतनी है कि वह अपना और बच्चे का खर्च उठा सके।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बच्चे की देखभाल करने वाली मां की जिम्मेदारी सिर्फ उसके खर्च उठाने तक सीमित नहीं होती। उसे बच्चे की परवरिश में अपना काफी समय और मेहनत भी लगानी पड़ती है।
कोर्ट ने आगे कहा कि मां द्वारा बच्चे की देखभाल में लगाए जाने वाले समय और मेहनत की कीमत पैसों में नहीं आंकी जा सकती। इसलिए गुजारा भत्ता तय करते समय इस जिम्मेदारी को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यह मामला 2014 में बेंगलुरु में शादी करने वाले एक दंपती से जुड़ा है। शादी के बाद दोनों अमेरिका चले गए थे, जहां पति इंजीनियर के रूप में काम करता था। इस दौरान उनके एक बेटा हुआ, लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया।
नवंबर 2017 में महिला अपने बेटे के साथ भारत लौट आई और अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। इसके बाद उसने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत मजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर की। महिला ने पति पर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे।
अप्रैल 2025 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने बच्चे के खर्च के लिए हर महीने 15 हजार रुपये, पढ़ाई के लिए सालाना 1.6 लाख रुपये और महिला को मुआवजे के तौर पर 8 लाख रुपये देने का आदेश दिया था।
हालांकि, महिला की शैक्षणिक योग्यता और नौकरी करने की क्षमता को देखते हुए अदालत ने उसे अलग से गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पति और पत्नी दोनों ने सेशंस कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी।
सेशंस कोर्ट ने पाया कि घरेलू हिंसा की याचिका दाखिल करते समय महिला बेरोजगार थी। पति ने अपनी संपत्ति और देनदारियों से जुड़े हलफनामे में भी यह नहीं बताया था कि पत्नी नौकरी करती है या उसके पास कमाई का कोई दूसरा जरिया है।
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि घरेलू हिंसा कानून में आर्थिक प्रताड़ना को भी हिंसा का एक रूप माना गया है। महिला की पढ़ाई-लिखाई या भविष्य में नौकरी पाने की संभावना उसके गुजारा भत्ते के अधिकार को खत्म नहीं करती।
इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने महिला की अपील स्वीकार कर ली और पति को हर महीने 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया।