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BJP-RSS Relationship: नितिन नबीन ने सुधारी नड्डा की ‘भूल’, नई टीम में RSS का दबदबा

BJP RSS Relationship: नितिन नबीन की नई टीम में आरएसएस और एबीवीपी से जुड़े नेताओं की मौजूदगी बढ़ी है। नई टीम में करीब 54 फीसदी पदाधिकारियों का संघ से जुड़ाव बताया जा रहा है। ऐसे में 2024 लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा और संघ के रिश्तों को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है।
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Aug 31, 2026
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बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ जेपी नड्डा। फोटो सोर्स- पत्रिका न्यूज

BJP RSS Relationship: आपको 2024 का लोकसभा चुनाव याद है? इस चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा। पार्टी 400 पार का नारा दे रही थी और अपने बूते बहुमत के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाई। बीजेपी के इस प्रदर्शन के पीछे एक बड़ी वजह बताई गई – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की नाराजगी। कहा गया कि संघ के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर सक्रिय नहीं हुए और भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। हालांकि, इस मुद्दे पर कभी खुलकर बात नहीं हुई। नितिन नबीन की नई टीम को गौर से देखने पर पता चलता है कि भाजपा वापस संघ की तरफ लौट रही है या कहें कि उसे यह अहसास हो गया है कि जड़ से दूर रहकर पनपा नहीं जा सकता है। इसलिए इस बार बीजेपी प्रेसिडेंट की नई टीम में संघ से जुड़ाव रखने वाले नेताओं का बोलबाला है। इस टीम में करीब 54 प्रतिशत पदाधिकारी ऐसे हैं, जो पहले आरएसएस से जुड़े रहे हैं। जबकि पूर्व पार्टी प्रेसिडेंट जे.पी. नड्डा की टीम में संघ से जुड़ाव रखने वालों की संख्या 50 प्रतिशत से कम थी।

एक बयान से बिगड़े थे रिश्ते

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, 2024 मेंजे.पी. नड्डा का एक बयान संभावित तौर पर भाजपा और संघ के बीच मनमुटाव की वजह बना। लोकसभा चुनाव से पहले नड्डा ने कहा था– भाजपा को अतीत में संघ की जरूरत थी, लेकिन अब वह अपने कामकाज को खुद संभालने में सक्षम है। इसके बाद संघ ने चुनाव से दूरी बना ली और भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जमीनी स्तर पर काम करके यह सुनिश्चित करता है कि भाजपा के पक्ष में माहौल बने और उसका कोर वोटर हर हाल में मतदान के लिए पहुंचे। लेकिन 2024 के चुनाव में आरएसएस के स्वयंसेवक सक्रिय नहीं हुए। मौजूद माहौल 2024 से कहीं ज्यादा अलग हो गया है। खासकर जेन जी आंदोलन ने भाजपा को अपनी रणनीति बदलने पर विवश किया है। इसके अलावा, राहुल गांधी को मिल रहे जनसमर्थन ने भी उसे चिंता में डाल दिया है। ऐसे में पार्टी संघ का हाथ फिर से अपने सिर पर चाहती है और नितिन नबीन की नई टीम इसी दिशा में बढ़ाया गया कदम है।

फोटो सोर्स-Ai

अमित शाह के समय ज्यादा दबदबा

भाजपा में आरएसएस की छाप वाले नेताओं की मौजूदगी सबसे ज्यादा अमित शाह के अध्यक्षीय कार्यकाल में थी। शाह 2014-2019 तक बीजेपी के नेशनल प्रेसिडेंट रहे। इस दौरान, पार्टी में शीर्ष पदों पर विराजमान 78.7% सदस्य आरएसएस या उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े हुए थे। इससे पहले, भाजपा अध्यक्ष के रूप में राजनाथ सिंह के कार्यकाल (2005-09) में यह आंकड़ा 77.41% और नितिन गडकरी के कार्यकाल (2010-13) में 60% था। जेपी नड्डा ने 20 जनवरी 2020 को अमित शाह के बाद भाजपा का अध्यक्ष पद संभाला था। उनके कार्यकाल में संघ से जुड़ाव रखने वाले नेताओं की संख्या काम हुई। अब लगता है जनवरी 2026 में पदभार ग्रहण करने वाले नितिन नबीन उस कमी को भरना चाहते हैं। हालांकि, नितिन नबीन का संघ के साथ कोई सीधा जुड़ाव नहीं है। कम से कम उनका प्रोफाइल तो यही बता रहा है। उनके पिता नबीन किशोर प्रसाद सिन्हा जरूर पटना में आरएसएस की शाखा में जाया जारते थे। वह पटना पश्चिम से चार बार विधायक रहे हैं।

इन नेताओं का है RSS से जुड़ाव

नितिन नबीन की टीम के 13 उपाध्यक्षों में से कम से कम पांच - तीरथ सिंह रावत, राम माधव, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा और डॉ. मधुचंदा कर, संघ से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं। रावत संघ के प्रचारक रहे हैं। इसके अलावा, 1980 के दशक में ABVP में विभिन्न पदों पर भी रहे। जबकि माधव का संघ से जुड़ाव बचपन से रहा है। इसी तरह, लाल सिंह आर्य सात साल की उम्र से ही संघ की शाखाओं में जाने लगे थे। नागराजा और मधुचंदा, दोनों एबीवीपी के सदस्य रह हैं। अपनी नई टीम में भी नितिन नबीन ने बी.एल. संतोष को राष्ट्रीय महासचिव (संगठन), शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव (संगठन) के पद पर बरकरार रखा है। राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) RSS का एक स्वयंसेवक होता है, जो दोनों संगठनों के बीच कड़ी के रूप में काम करता है।

फोटो सोर्स-Ai

बीजेपी प्रेसिडेंट की नई टीम के आठ महासचिवों में से कम से कम 7 का आरएसएस या एबीवीपी से जुड़ाव रहा है। इसमें विनोद तावड़े, सुनील बंसल, हरीश द्विवेदी, संजय भाटिया, डॉ. सतीश पूनिया, बिप्लब कुमार और गजेंद्र पटेल शामिल हैं। ठीक इसी तरह, नितिन नबीन द्वारा नियुक्त 16 सचिवों में से कम से कम छह का आरएसएस या एबीवीपी से कोई न कोई रिश्ता रहा है। इनमें के. सुरेंद्रन, डॉ. प्रदीप वर्मा, डॉ. एम. वेंकटेशन, डॉ. स्वदेश सिंह, मनोज तिग्गा और जय प्रकाश शामिल हैं। वहीं, चार मीडिया कन्वीनर और को-कन्वीनर में से तीन संघ से जुड़े रहे हैं।

कुल मिलाकर भाजपा 2024 वाली गलती दोहराना नहीं चाहती। वह संघ को साथ लेकर, उसकी छत्रछाया में चुनावी चुनौतियों का सामना करना चाहती है और उसके लिए यह जरूरी भी है। क्योंकि इस बार के चुनाव काफी अलग होंगे। भाजपा को Gen Z को साधना है, असन्तुष्ट मतदाताओं को फिर से साथ लाना है।

Updated on:
31 Aug 2026 04:30 pm
Published on:
31 Aug 2026 04:30 pm
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