लोकसभा के बजट सत्र में हुए हंगामे को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। बीजेपी महिला सांसदों ने अध्यक्ष ओम बिरला से सख्त कार्रवाई की मांग की, जबकि कांग्रेस ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया।
संसद का बजट सत्र हमेशा से राजनीतिक बहस और टकराव का मंच रहा है। हाल के दिनों में लोकसभा में हुए घटनाक्रम ने एक बार फिर संसदीय मर्यादाओं को लेकर चर्चा तेज कर दी है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान हुए हंगामे को लेकर अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस आमने-सामने आ गई हैं, जहां महिला सांसदों की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समर्थन और विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
बीजेपी की महिला सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विपक्षी महिला सांसदों पर गंभीर आरोप लगाए। पत्र में कहा गया कि 4 फरवरी को विपक्षी सांसदों ने प्रधानमंत्री की सीट को घेरा और बाद में आक्रामक तरीके से अध्यक्ष के कक्ष की ओर बढ़ीं। सांसदों का दावा है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने सदन के वेल में प्रवेश किया, मेजों पर चढ़े, कागज फाड़े और उन्हें अध्यक्ष की ओर फेंका। बीजेपी ने इसे संसदीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पलों में से एक बताया और इस पूरे मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग की।
बीजेपी सांसदों ने अपने पत्र में कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने लगभग सात साल के कार्यकाल में सदन की गरिमा बढ़ाने और निष्पक्षता बनाए रखने का लगातार प्रयास किया है। पार्टी का कहना है कि अध्यक्ष ने हमेशा दलगत भेदभाव से ऊपर उठकर सभी सांसदों को समान अवसर दिए। इस बीच ओम बिरला ने यह भी बताया कि संभावित अप्रिय घटना की आशंका के चलते उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में न आने का आग्रह किया था। उनका कहना था कि उन्हें जानकारी मिली थी कि कुछ कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंचने का प्रयास कर सकते हैं।
वहीं कांग्रेस की महिला सांसदों ने बीजेपी के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कांग्रेस का कहना है कि उनका विरोध शांतिपूर्ण था और संसदीय नियमों के अनुरूप था, लेकिन उन्हें अभूतपूर्व तरीके से निशाना बनाया गया। कांग्रेस सांसदों ने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लगातार चार दिनों तक बोलने का मौका नहीं दिया गया, जबकि एक बीजेपी सांसद को पूर्व प्रधानमंत्रियों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की अनुमति मिली। कांग्रेस का यह भी दावा है कि जब उन्होंने इस मामले में अध्यक्ष से शिकायत की, तो पहले गलती मानी गई, लेकिन बाद में सरकार के दबाव में उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए। यह पूरा विवाद लोकसभा में राजनीतिक गतिरोध और बढ़ते टकराव की तस्वीर पेश करता है।