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जनसंघ नेता दीन दयाल की मुगलसराय रेलवे यार्ड में मिली थी लाश, लखनऊ से पटना के लिए ट्रेन से हुए थे रवाना

आज जनसंघ के नेता दीन दयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि है। उनकी मौत रहस्यमय परिस्थिति में हुई थी। उनके पुण्यतिथि के मौके पर पीएम मोदी, गृहमंत्री शाह ने श्रद्धांजलि दी है।

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Feb 11, 2026
दीन दयाल उपाध्याय (फोटो-BJP)

आज जनसंघ नेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि है। उनके पुण्यतिथि के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ और अन्य नेताओं ने श्रद्धांजलि दी है। दीन दयाल की मौत 11 फरवरी 1968 को हुई थी। उनका शव मुगलसराय रेलवे यार्ड के पास मिला था।

12 फरवरी 1968 को भारतीय जनसंघ संसदीय दल की बैठक नई दिल्ली में आयोजित होने वाली थी, लेकिन इससे पहले बिहार प्रदेश की कार्यकारिणी की बैठक भी थी। लिहाजा, बिहार के संगठन मंत्री अश्विनी कुमार ने जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित दीन दयाल को बैठक में शामिल होने का न्योता दिया।

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लखनऊ में अपनी बहन के यहां ठहरे हुए थे दीन दयाल

लेखक अमरजीत सिंह ने अपनी किताब 'एकांत मानववाद के प्रणेता दीन दयाल उपाध्याय' में लिखा कि उस दौरान दीन दयाल लखनऊ में अपनी मुंबबोली बहन लता खन्ना के घर पर ठहरे हुए थे। इसके चलते उन्होंने अश्विनी का न्योता स्वीकार कर लिया और कहा कि अगर दिल्ली संसदीय महामंत्री सुंदर सिंह भंडारी ने बैठक में सम्मिलित होने के लिए उनसे आग्रह नहीं किया तो वे पटना अवश्य आएंगे और उन्होंने स्वीकृति दे दी।

इसके बाद उन्होंने 10 फरवरी की शाम को 7 बजे लखनऊ से पटना के लिए पठानकोट-सियालदह एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी की टिकट करवाई। दीन दयाल समय पर रेलवे स्टेशन पहुंचे। उनके पास एक सूटकेस, बिस्तर, टिफिन और पुस्तकों का थैला था। दीनदयाल को छोड़ने के लिए यूपी के तत्कालीन उप मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त और एमएलसी पीतांबर दास भी पहुंचे। वहीं, इसी ट्रेन से भारतीय भौगोलिक सर्वेक्षण के असिस्टेंट डायरेक्टर एमपी सिंह, कांग्रेस एमएलसी सदस्य गौरीशंकर राय भी सफर कर रहे थे।

लखनऊ से पटना के लिए ट्रेन की सीट पर बैठे

ट्रेन के लखनऊ स्टेशन पहुंचने पर दीन दयाल फर्स्ट कैटेगरी में सी कंपाट्रमेंट में अपनी सीट पर बैठ गए। ट्रेन लखनऊ रेलवे स्टेशन से रवाना हो गई। देर रात ट्रेन जौनपुर पहुंची। यहां दीन दयाल के दोस्त महराज उनसे मिलने के लिए रेलवे स्टेशन पहुंचे। दरअसल, दीन दयाल ने अपने सेवक के जरिए दोस्त महाराज को यात्रा के विषय में पहले से अवगत करा दिया था। जौनपुर से ट्रेन रवाना होने के बाद देर रात 1.40 बजे वाराणसी पहुंची। फिर 2:10 बजकर मुगलसराय पहुंची। यहां सियालदाह एक्सप्रेस की बोगी काटकर दिल्ली-हावड़ा एक्सप्रेस से जोड़ी गई, क्योंकि सियालदाह एक्सप्रेस पटना नहीं जाती थी। यह प्रक्रिया लगभग 30-40 मिनट चली। 2:50 बजे ट्रेन पटना के लिए रवाना हुई। लेकिन दीन दयाल उपाध्याय ट्रेन में नहीं थे। 11 फरवरी 1968 की सुबह 3 बजे उनका शव ट्रेन की पटरियों पर मिला।

दूसरी ओर, जब ट्रेन सुबह 6 बजे पटना पहुंची तो जनसंघ के नेता टकटकी लगाए दीन दयाल के बोगी से उतरने का इंतजार कर रहे थे। रेलवे स्टेशन पर बिहार के कार्यकर्ताओं को कोई खोज खबर नहीं मिली। साढ़े 9 बजे गाड़ी मुकामा स्टेशन पर पहुंची, जहां कंपार्टमेंट में सीट के नीटे रखे हुए सूटकेस मिली।

लाइनमैन ईश्वर दयाल ने सबसे पहले देखा था शव

इधर, रेलवे यार्ड के पास दीन दयाल की लाश मिलने से हड़कंप मच गया था। सबसे पहले लाइनमैन ईश्वर दयाल ने दीन दयाल उपाध्याय के शव को देखा था। दीन दयाल का शव पीठ के बल था और कमर से मुंह तक दुशाला से ढका हुआ था। दाएं हाथ में 5 रुपये का नोट कसकर पकड़ा हुआ। जेब में 26 रुपये, प्रथम श्रेणी टिकट, रिजर्वेशन रसीद और एक घड़ी (जिस पर "नानाजी देशमुख" लिखा था)। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में मौत की वजह ट्रेन से गिरने की वजह से हुई चोट बताई गई।

सरकार ने दीन दयाल की रहस्यमयी परिस्थिति में हुई मौत को लेकर जांच का जिम्मा CBI को सौंपा। CBI ने दो छोटे चोरों (भरत लाल और राम अवध) को गिरफ्तार किया। आरोपियों ने कबूल किया कि दीन दयाल ने चोरी पकड़ ली और पुलिस बुलाने की धमकी दी, तो उन्हें धक्का दिया। दोनों गिरफ्तार हुए, लेकिन हत्या के आरोप में बरी कर दिए गए। इसके बाद 1969 में इंदिरा सरकार ने एकल सदस्यीय चंद्रचूड़ आयोग का गठन किया। आयोग ने भी सीबीआई निष्कर्ष से सहमति जताई।

अटल पर बलराज मधोक ने लगाया हत्या का आरोप

जनसंघ के पूर्व नेता बलराज मधोक ने बाद के वर्षों में अपनी आत्मकथा "ज़िंदगी का सफर" के तीसरे खंड "दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इंदिरा गांधी की हत्या तक" में पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और जनसंघ नेता नानाजी देशमुख पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पंडित दीन दयाल उपाध्याय की मौत हत्या थी, न कि दुर्घटना या चोरी। उन्होंने अपनी किताब में लिखा कि हत्या के पीछे जनसंघ/आरएसएस के कुछ वरिष्ठ नेता शामिल थे, जिनमें मुख्य रूप से अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख का नाम लिया था।

Published on:
11 Feb 2026 11:25 am
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