
नई दिल्ली में शनिवार को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में समूह के नेताओं ने आम नागरिकों से जुड़ी सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की पूरी निगरानी में संचालित शांतिपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों पर "जानबूझकर किए गए हमलों" को लेकर गंभीर चिंता जताई। भारत की मेजबानी में हुए इस सम्मेलन में तमाम मतभेदों के बावजूद 11 देशों के इस समूह ने सर्वसम्मति से एक संयुक्त घोषणापत्र स्वीकार किया, जिसमें मध्य पूर्व में अधिकतम संयम बरतने और नागरिक तथा परमाणु ढांचे की सुरक्षा की अपील की गई।
घोषणापत्र में साफ शब्दों में कहा गया कि 'सशस्त्र संघर्षों' के दौरान भी परमाणु सुरक्षा और संरक्षा को हमेशा बनाए रखा जाना चाहिए, ताकि लोगों और पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सके। यह बयान अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर किए गए हमलों की परोक्ष आलोचना के तौर पर देखा जा रहा है।
गौरतलब है कि इससे पहले मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच मतभेदों के चलते कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो पाया था। लेकिन मेजबान भारत के गहन कूटनीतिक प्रयासों के बाद शनिवार को नेताओं की बैठक में यह बयान जारी किया गया।
नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनधिकृत एकतरफा प्रतिबंधों की भी आलोचना की, हालांकि किसी देश का सीधे नाम नहीं लिया गया। यह टिप्पणी रूस पर लगे पश्चिमी प्रतिबंधों की पृष्ठभूमि में अहम मानी जा रही है।
ब्रिक्स, जिसकी स्थापना 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने की थी और बाद में दक्षिण अफ्रीका सहित कई अन्य देश जुड़े, अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और आबादी के लिहाज से एक अहम मंच बन चुका है। यह घोषणापत्र समूह की एकजुटता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान समेत कई शीर्ष नेता शामिल हुए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में कहा कि मध्य पूर्व का युद्ध अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साझा हितों के अनुकूल नहीं है, और उन्होंने ब्रिक्स समूह से शांतिदूत की भूमिका निभाने का आग्रह किया।