
BRICS Summit 2026: भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। इससे पहले पूर्व राजनयिकों ने BRICS की ताकत, उसके भीतर मौजूद मतभेदों और भारत की भूमिका को लेकर अहम बातें कही हैं। पूर्व राजनयिक महेश सचदेव ने कहा कि भारत के पास BRICS और पश्चिमी देशों के बीच पुल की भूमिका निभाने का महत्वपूर्ण मौका है। वहीं, पूर्व राजनयिक सुरेंद्र कुमार ने कहा कि भारत को सम्मेलन का फोकस व्यावहारिक आर्थिक सहयोग पर रखना चाहिए।
महेश सचदेव ने कहा कि BRICS को अस्तित्व में आए 20 साल हो चुके हैं। ऐसे में अब इस समूह से ज्यादा ठोस और प्रभावी काम की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि BRICS के भीतर आर्थिक और राजनीतिक ताकत बढ़ी है लेकिन सदस्य देशों के बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी हैं।
सुरेंद्र कुमार ने कहा कि BRICS के सदस्य देशों में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है। समूह की आर्थिक ताकत भी काफी बड़ी है। PPP के आधार पर इसका हिस्सा G7 से बड़ा बताया जाता है। हालांकि, सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद इसकी बड़ी चुनौती हैं।
महेश सचदेव ने कहा कि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत की स्थिति खास है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच भारत के कई देशों के साथ संबंध हैं। ऐसे में भारत BRICS और पश्चिमी देशों के बीच संवाद का रास्ता बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वैश्विक व्यवस्था में बदलाव का मतलब एक बड़ी ताकत की जगह दूसरी बड़ी ताकत का दबदबा नहीं होना चाहिए। सचदेव ने चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया को एक प्रभुत्व की जगह दूसरे प्रभुत्व से बचना होगा।
सुरेंद्र कुमार ने कहा कि BRICS में राजनीतिक मुद्दों पर सभी देशों का एकमत होना मुश्किल है। इसलिए भारत को आर्थिक सहयोग, तकनीक साझा करने और विकास से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत डिजिटल सार्वजनिक ढांचे के क्षेत्र में अपने अनुभव को BRICS देशों के साथ साझा कर सकता है। भारत ने कई देशों के साथ समझौते किए हैं और कई देशों में UPI काम कर रहा है। इसके अलावा व्यापार बढ़ाने, वित्तीय सहयोग मजबूत करने और छोटे कारोबारों को समर्थन देने जैसे क्षेत्रों में भी काम किया जा सकता है।
महेश सचदेव ने कहा कि वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में बदलाव करते समय यह ध्यान रखना होगा कि किसी एक देश का दबदबा न बढ़े। उन्होंने कहा कि अगर डॉलर पर निर्भरता कम करने के बाद किसी दूसरी एकल मुद्रा को उसी स्थिति में रखा जाता है तो व्यवस्था की मूल समस्या खत्म नहीं होगी।
उन्होंने BRICS के भीतर चीन के बड़े आर्थिक प्रभाव का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, वैश्विक व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने की कोशिश का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि अमेरिका की जगह चीन का प्रभुत्व स्थापित हो जाए।
भारत की अध्यक्षता में BRICS शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होगा। भारत ने इस साल BRICS के लिए 'लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता' को मुख्य विषय बनाया है।
पूर्व राजनयिकों के मुताबिक, भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अलग-अलग विचार रखने वाले देशों को एक मंच पर लाए। साथ ही, BRICS को सिर्फ राजनीतिक मतभेदों का मंच बनने से रोककर व्यापार, तकनीक, विकास और वित्तीय सहयोग जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर आगे बढ़ाए। यही भारत के लिए इस सम्मेलन की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा होगी।