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‘आप भारत सरकार हैं, पीड़िता का नाम कैसे छाप दिया?’, POSH हैंडबुक पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को लगाई कड़ी फटकार

POSH हैंडबुक में ज्यादती की पीड़िता की पहचान उजागर होने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाई। कोर्ट ने जिम्मेदार अधिकारियों के नाम मांगे हैं।
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भारत

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Rahul Yadav

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Updated: 9 Sep 2026, 6:54 AM IST

Delhi HC POSH Handbook

POSH हैंडबुक में ज्यादती पीड़िता की पहचान उजागर होने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र को फटकार लगाई। (फोटो - चैटजीपीटी)

Delhi HC POSH Handbook:दिल्ली हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर ज्यादती से जुड़ी एक सरकारी हैंडबुक में पीड़िता का नाम उजागर होने पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सवाल किया कि सरकार की तरफ से प्रकाशित और आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध हैंडबुक में पीड़िता की पहचान कैसे सामने आ गई। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर को तय की है।

आप भारत सरकार हैं, ऐसा कैसे कर सकते हैं?

सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा इसमें पीड़िता का नाम कैसे उजागर किया गया? आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? आप भारत सरकार हैं। कोर्ट ने कहा कि केंद्र खुद ऐसी हैंडबुक प्रकाशित कर रहा है जिसमें पीड़िता की पहचान सामने आ रही है। यह हैंडबुक सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर भी उपलब्ध है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार के वकील से उन अधिकारियों के नाम बताने को कहा जो इस सामग्री के लिए जिम्मेदार हैं। अधिकारियों के नाम अगली सुनवाई में पेश करने का निर्देश दिया गया है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से जारी कार्यस्थल पर ज्यादती की रोकथाम यानी पॉश हैंडबुक से जुड़ा है। याचिकाकर्ता उस मामले में आरोपी था। उसके वकील ने कोर्ट को बताया कि संबंधित घटना से जुड़े श्रम न्यायाधिकरण के आदेश को हैंडबुक में एक उदाहरण के तौर पर शामिल किया गया है। वकील के मुताबिक, इस उदाहरण में आरोपी की पहचान के साथ-साथ ज्यादती की पीड़िता का नाम भी उजागर हो गया। उन्होंने कहा कि यह हैंडबुक इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है।

2015 में प्रकाशित हुई थी हैंडबुक

केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह हैंडबुक नवंबर 2015 में शैक्षणिक उद्देश्य से प्रकाशित की गई थी। दोनों पक्षों के बीच विवाद का हाल में निपटारा हुआ है।इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि समझौता होने से पीड़िता का नाम उजागर करने की अनुमति नहीं मिल जाती। जस्टिस शर्मा ने कहा कि किसी फैसले में भी पीड़िता का नाम उजागर नहीं किया जा सकता। शैक्षणिक उद्देश्य के लिए भी पीड़िता का नाम बताने की जरूरत नहीं है।

जज भी X लिखते हैं

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की पहचान छिपाने के लिए न्यायालयों में नाम की जगह 'X' लिखा जाता है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले और हाईकोर्ट के निर्देश पहले से मौजूद हैं। पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती और ऐसा करना दंडनीय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता की पहचान की सुरक्षा से जुड़े न्यायिक निर्देश 2015 से पहले भी मौजूद थे। इसलिए अधिकारी कानून का पालन करने की अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

गूगल से सामग्री हटाने की भी मांग

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से हैंडबुक में मौजूद सामग्री को हटाने का निर्देश देने की मांग की है। इसके साथ ही गूगल को इस सामग्री को खोज परिणामों से हटाने और उससे जुड़ी कड़ियां हटाने का निर्देश देने की मांग भी की गई है। अब मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर यानि आज को होगी। उस दिन केंद्र सरकार को सामग्री के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के नाम भी कोर्ट के सामने रखने होंगे।

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