
Karnataka SIR: कर्नाटक में एसआईआर और मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी घमासान तेज हो गया है। कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने रविवार को कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि राज्य की कांग्रेस सरकार SIR प्रक्रिया को लेकर जानबूझकर विवाद खड़ा कर रही है। उन्होंने दावा किया कि फॉर्म-7 के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाने के आवेदनों के मामले में बीजेपी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए राज्य पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है।
विजयेंद्र ने SIR प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि इसे सुप्रीम कोर्ट और सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कई न्यायाधीशों का समर्थन मिला है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह चुनाव आयोग का बचाव नहीं कर रहे, बल्कि इस प्रक्रिया के समर्थन में न्यायिक संदर्भों का हवाला दे रहे हैं।
उन्होंने कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को स्वीकार नहीं कर पाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दल अशांति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
इस दौरान विजयेंद्र ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बयानों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भाजपा को तानाशाही पर उपदेश देने से पहले कांग्रेस को अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने राज्य की कांग्रेस सरकार पर शासन की विफलताओं और आर्थिक संकट से जनता का ध्यान भटकाने के लिए SIR के मुद्दे को तूल देने का भी आरोप लगाया।
बता दें कि बीजेपी नेता विजयेंद्र का यह बयान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों के बाद आया है। खरगे ने आरोप लगाया था कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था होने के बावजूद स्वतंत्र रूप से फैसले नहीं ले पा रहा है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री मोदी पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि 'वोट चोरी' के जरिए केंद्र और राज्यों में सरकारें बनाई गई हैं। खरगे ने इसे लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।उन्होंने कहा कि कांग्रेस इन मुद्दों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखेगी।
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा उनकी सेवा शर्तों से जुड़े वर्ष 2023 के कानून पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इस कानून के जरिए चुनाव आयुक्तों को ऐसी कानूनी सुरक्षा दी गई, जो उनके मुताबिक राष्ट्रपति और भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी उपलब्ध नहीं है।
उन्होंने दावा किया कि इस कानूनी प्रावधान से चुनाव आयुक्तों को उनके कार्यकाल के दौरान किए गए कामों के लिए व्यापक संरक्षण मिलता है। उन्होंने इसे चुनावी प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों से जोड़ते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए।