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समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय कटाव बढ़ा रहे खतरा, भारत के कई राज्यों के तट संवेदनशील

समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय कटाव भारत के समुद्री इलाकों के लिए गंभीर खतरा बन रहे हैं। तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल तक कई क्षेत्र प्रभावित हैं। जानिए चेन्नई में जमीन धंसने, तटरेखा के बदलने और समुद्र में भूभाग डूबने के बावजूद किसी देश की संप्रभुता कायम रहने के कानूनी प्रावधान।
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भारत

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Anurag Animesh

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कानाराम मु​ण्डियार

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Oct 11, 2026

Rising sea levels news

समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय कटाव

Rising sea levels: समुद्र का बढ़ता जलस्तर और तटीय कटाव अब केवल समुद्र किनारे बसे गांवों के लिए खतरा नहीं रह गया है, बल्कि सड़क, पार्क, मकान, पर्यटन स्थल और मछुआरों की बस्तियां भी इसकी चपेट में आ रही हैं। तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के कुलसेकरपट्टिनम गांव में समुद्र ने बच्चों के पार्क का आधे से अधिक हिस्सा निगल लिया है। पार्क की चारदीवारी और झूले समुद्र में गिर चुके हैं। पिछले एक साल में यहां 100 मीटर से ज्यादा तट का कटाव हुआ है और समुद्र करीब 20 मीटर जमीन की ओर बढ़ा है। स्थानीय लोगों के अनुसार तट पर लगे 150 से अधिक पनैय्या पेड़ भी समुद्र में समा चुके हैं। स्थानीय पर्यावरणविदों ने कुलसेकरपट्टिनम में उत्तर में बने अपतटीय कोयला जेट्टी और दक्षिण में बने ग्रोइन ढांचों को तट पर रेत के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव से जोड़ते हुए चिंता जताई है। जिला प्रशासन ने मामले में तकनीकी अध्ययन के लिए आईआईटी मद्रास के समुद्री अभियांत्रिकी विभाग से संपर्क किया है। राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र के आकलन के अनुसार 1990 से 2018 के बीच भारत की करीब 33.6 प्रतिशत तटरेखा कटाव के प्रति संवेदनशील पाई गई। वहीं 26.9 प्रतिशत हिस्से में समुद्र तट आगे बढ़ा और 39.6 प्रतिशत हिस्सा स्थिर रहा। करीब 2,318 किलोमीटर तटरेखा में कटाव दर्ज किया गया।

चेन्नई में समुद्र के साथ जमीन भी धंस रही


चेन्नई के लिए समस्या और गंभीर है, क्योंकि यहां समुद्र का स्तर बढ़ने के साथ कुछ तटीय इलाकों में जमीन भी नीचे धंस रही है। 2026 में प्रकाशित वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक चेन्नई के समुद्र तट से 30 किलोमीटर के दायरे में कुछ स्थानों पर जमीन के धंसने की दर 15 मिलीमीटर सालाना तक पाई गई। इसी अध्ययन में चेन्नई क्षेत्र में समुद्र-स्तर वृद्धि करीब 2.8 मिलीमीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई। यानी कुछ स्थानों पर जमीन का नीचे जाना समुद्र-स्तर बढ़ने के प्रभाव को और बढ़ा सकता है।

पूर्वी तट पर खतरा ज्यादा व्यापक : अध्ययन में खुलासा


2026 के एक अध्ययन में तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल तक पूर्वी तट के कई इलाकों को समुद्री बाढ़ और तटीय बदलाव के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील पाया गया। तमिलनाडु का नागपट्टिनम, आंध्र प्रदेश का कृष्णा, ओडिशा का जगतसिंहपुर और पश्चिम बंगाल का उत्तर 24 परगना ऐसे जिलों में हैं जहां बड़ी संख्या में गांव और कस्बे बहुत अधिक जोखिम वाले क्षेत्र में आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अब तटों की सुरक्षा केवल पत्थर की दीवार या ग्रोइन बनाने तक सीमित रखने के बजाय समुद्र-स्तर वृद्धि, तट के पीछे हटने की दर, जमीन के धंसने और समुद्री लहरों के संयुक्त प्रभाव को ध्यान में रखकर करनी होगी। चेन्नई का पार्क इस बदलती तटीय चुनौती की एक स्थानीय तस्वीर है, लेकिन देश के कई समुद्री गांवों के लिए यह आने वाले समय का बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

बड़ा सवाल, क्या वाकय में समुद्र का स्तर बढ़ रहा है?


वैश्विक स्तर पर समुद्र-स्तर वृद्धि की रफ्तार पिछले दशकों में तेज हुई है। विश्व मौसम संगठन के आंकड़ों के अनुसार 1993-2002 के दौरान औसत वृद्धि करीब 2.1 मिलीमीटर सालाना थी, जो 2015-2024 में बढ़कर 4.7 मिलीमीटर सालाना हो गई। 2024 में वैश्विक समुद्र-स्तर करीब 6 मिलीमीटर बढ़ा, जो रिकॉर्ड वार्षिक वृद्धि रही। लेकिन किसी खास गांव या शहर में जमीन समुद्र में जाने का कारण केवल समुद्र-स्तर बढ़ना नहीं होता। तटीय कटाव, तेज लहरें, चक्रवात, समुद्री धाराओं में बदलाव, रेत की आवाजाही रोकने वाले बंदरगाह और तट सुरक्षा ढांचे तथा जमीन का धंसना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राज्यवार कटाव से प्रभावित समुद्र तटरेखा

क्रम संख्याराज्य/केंद्र शासित प्रदेशकटाव से प्रभावित समुद्र तटरेखा
1पश्चिम बंगाल60.5%
2पुदुचेरी56.2%
3केरल46.4%
4तमिलनाडु42.7%
5आंध्र प्रदेश28.7%
6गुजरात27.6%
7ओडिशा25.6%
8महाराष्ट्र25.5%

स्रोत: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय एवं राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र।

समुद्र का जलस्तर बढ़ने से यदि किसी देश का भूभाग डूब जाए या रहने योग्य न रहे, तब भी उसकी राज्यसत्ता स्वतः समाप्त नहीं होगी। संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग की इस विषय पर तैयार कानूनी पहलुओ में राज्यसत्ता की निरंतरता के सिद्धांत को समर्थन दिया गया है। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से प्रभावित छोटे द्वीपीय देशों की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय अधिकारों की रक्षा करना है। आयोग ने प्रशांत महासागर में स्थित तुवालू और किरिबाती जैसे द्वीपीय देशों के साथ-साथ मालदीव जैसे संवेदनशील देशों द्वारा सामना किए जा रहे भू-क्षति के खतरे पर ध्यान केंद्रित किया है।

द्वीपीय देश तुवालू बना उदाहरण


प्रशांत महासागर का छोटा द्वीपीय देश तुवालू समुद्र के बढ़ते स्तर से प्रभावित है। दिसंबर 2025 तक, तुवालू की 11,000 की आबादी में से एक तिहाई से अधिक लोगों ने द्विपक्षीय संधि के तहत ऑस्ट्रेलिया में प्रवास करने के लिए जलवायु वीजा के लिए आवेदन किया था। समझौते के तहत उसके नागरिकों के लिए जलवायु आधारित प्रवास का विकल्प उपलब्ध कराया गया है। इसका उद्देश्य लोगों को सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से दूसरे देश में बसने का अवसर देना है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसा देश तटरेखा के पीछे हटने पर भी अपनी समुद्री सीमाओं को बनाए रखेगा।

राज्य की पहचान के चार आधार


1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुसार, किसी राज्य की पहचान के चार प्रमुख आधार हैं-स्थायी आबादी, परिभाषित भूभाग, सरकार और अन्य देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता। समुद्र का बढ़ता जलस्तर इन मानदंडों के सामने नई चुनौती खड़ी कर रहा है। ऐसे में भूभाग के डूबने या आबादी के विस्थापित होने पर भी राज्य की कानूनी पहचान बनाए रखने का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है।

समुद्री सीमाओं पर भी अधिकार


छोटे द्वीपीय देशों के लिए समुद्री सीमाएं आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम हैं। तटरेखा पीछे हटने पर भी समुद्री सीमाओं को स्थिर बनाए रखने की अवधारणा का समर्थन किया गया है। इसमें तट से 12 समुद्री मील तक का प्रादेशिक समुद्र और 200 समुद्री मील तक का विशेष आर्थिक क्षेत्र शामिल है, जहां संबंधित देश को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के विशेष अधिकार मिलते हैं।