CEC Gyanesh Kumar: विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी की है। जानिए आरोप क्या हैं, SIR विवाद क्या है और भारत में CEC को हटाने की प्रक्रिया क्या होती है।
CEC Gyanesh Kumar: संसद के बजट सत्र में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला (Om Birla) के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव खारिज होने के बाद अब विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जा रहा है। लोकसभा में प्रस्ताव देने के लिए अब तक लगभग 120 सांसदों और राज्यसभा में लगभग 60 सांसदों ने नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए यह पहली बार होगा जब ऐसा नोटिस दिया जाएगा।
विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना चाहता है, क्योंकि उनका मानना है कि वे कई मौकों पर सत्तारूढ़ भाजपा को फायदा पहुंचाने में मदद कर रहे हैं।
विपक्षी दल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सात आरोपों की सूची तैयार कर सकते हैं, जिनमें भेदभावपूर्ण व्यवहार, चुनावी धोखाधड़ी (इलेक्शन फ्रॉड) की जांच में जानबूझकर रुकावट डालना और SIR के जरिए बड़े पैमाने पर लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करना शामिल है।
हालांकि चुनाव आयोग (EC) का SIR कई राज्यों में विवादास्पद रहा है, लेकिन विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में इसने काफी विवाद पैदा किया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने राज्य में इस प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग असली मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा रहा है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के प्रस्ताव के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के महाभियोग जैसी ही होती है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से केवल उसी प्रकार और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है। साथ ही, उनकी नियुक्ति के बाद उनकी सेवा की शर्तों में उनके नुकसान के लिए कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के आधार 2023 के “Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act” की धारा 11(2) में भी निर्धारित किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि CEC को हटाना न्यायाधीशों के समान आधार और प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में से किसी में भी में लाया जा सकता है। प्रस्ताव प्रस्तुत होने के बाद सदन के अध्यक्ष या सभापति यह निर्णय लेते हैं कि उसे स्वीकार किया जाए या अस्वीकार।
यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया जाता है। इस समिति में एक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, एक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और एक कानूनी विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
समिति आरोप तय करती है और जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट सभापति या अध्यक्ष को सौंपती है। यदि रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता साबित होती है, तो हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान कराया जाता है।
प्रस्ताव पारित होने के लिए दोनों सदनों में “उपस्थित और मतदान करने वाले” सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का समर्थन आवश्यक होता है। साथ ही, पक्ष में पड़े वोटों की संख्या सदन की कुल सदस्यता के 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए।
दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद इसे भारत के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलते ही मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटा दिया जाता है।