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केंद्र सरकार के हाथ में जाएगी खदान और खनन जमीनों पर टैक्स की ‘चाबी’!

खदान और खनन ज़मीनों पर टैक्स की 'चाबी' केंद्र सरकार के हाथ में जाने वाली है। क्या है पूरा मामला? आइए जानते हैं।
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Aug 11, 2026
PM Narendra Modi chairs cabinet meeting
पीएम नरेंद्र मोदी की कैबिनेट मीटिंग (Photo - ANI)

केंद्र सरकार (Central Government) राज्यों की खदानों और खनिज संपन्न जमीनों पर अपना नियामक नियंत्रण बढ़ाने जा रही है। सरकार ने खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए संसद में संशोधित कानून का प्रस्ताव किया है जिससे राज्यों की खनिज राजस्व जुटाने और खनिज संसाधनों पर वित्तीय अधिकार की मौजूदा तस्वीर बदल जाएगी। इसकी 'चाबी' केंद्र सरकार के पास होगी। खदान मंत्री जी.किशन रेड्डी ने सोमवार को लोकसभा में माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल (एमएमडीआर) पेश किया है जिसके तहत खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर टैक्स, रॉयल्टी, सेस या अन्य लेवी मनमाने तरीके से नहीं लगा सकेंगी। ऐसे टैक्स पर केंद्र सरकार शर्तें और प्रतिबंध तय कर सकेगी।

खनिज वाली जमीन को लेकर बड़ा कानूनी बदलाव

खास बात यह है कि पहली बार सामान्य खनिज वाली जमीन को लेकर भी बड़ा कानूनी बदलाव किया जा रहा है। अगर किसी जमीन में तय मात्रा में खनिज हैं, तो उसके इस्तेमाल और नियमन में केंद्र सरकार की भूमिका बढ़ जाएगी। मौजूदा कानून में केंद्र सरकार का नियंत्रण मुख्यत: खदानों और खनिजों के विकास तक ही है। नए बिल में इसका दायरा खनिज वाली जमीन तक बढ़ा दिया गया है। विधेयक में केंद्र को एमएमडीआर कानून की धारा 13 में संशोधन करके इन शर्तों और प्रतिबंधों को निर्धारित करने वाले नियम बनाने का अधिकार देने का प्रावधान है।

बन सकता है केंद्र-राज्य टकराव का मुद्दा

जानकार सूत्रों का कहना है कि खदान एवं खनिज पर नियंत्रण के प्रस्तावित संशोधनों से केंद्र और राज्यों में टकराव का नया मुद्दा बन सकता है। खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने के अधिकार के विवाद पर जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच ने फैसले में रॉयल्टी को टैक्स नहीं मानते हुए कहा था यह लागू करने का अधिकार राज्य का है। अदालत ने कहा था कि एमएमडीआर कानून अधिनियम ने उन शक्तियों पर कोई सीमा नहीं लगाई है लेकिन संसद खनिज विकास से संबंधित कानून के माध्यम से ऐसा कर सकती है। केंद्र के संशोधित कानून से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव उलटने के साथ दायरा बढ़ता जा रहा है।

राज्यों का पुराना बकाया नहीं मिलेगा

बिल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ भविष्य के टैक्स पर रोक नहीं है। प्रस्तावित नई धारा 9 डी के मुताबिक अगर किसी राज्य सरकार ने संशोधित प्रावधान लागू होने से पहले खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर ऐसा टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाया है, लेकिन वो राशि जमा नहीं कराई गई तो उसे अवैध माना जाएगा। यानी इसे जमा कराने की ज़रूरत नहीं होगी। जो राशि पहले ही जमा या वसूल हो चुकी है, उसे वापस करने की देनदारी नहीं होगी।

केंद्र का तर्क: देश में समान टैक्स ढांचा जरूरी

कानून में संशोधन के पीछे केंद्र सरकार का तर्क है कि खनिज संसाधन सीमित होने के साथ कुछ राज्यों तक सीमित है। खनिजों के खनन और प्रबंधन से देश के आर्थिक विकास की समग्र रणनीति में सतत, न्याय संगत और एकीकृत विकास होना चाहिए और पूरे देश में समान टैक्स ढांचा होना चाहिए।

सरकार ने गिनाए यह बड़े कारण

केंद्र सरकार ने ऐसा करने के पीछे बड़े कारण गिनाए हैं। सरकार के अनुसार खनन पर दोहरे-तिहरे टैक्स का बोझ बढ़ रहा है। अलग-अलग टैक्स और लेवी से खनन कंपनियों की लागत बढ़ रही है। खनन शुरू होने के बाद भी राज्यों की ओर से नया टैक्स, सेस या दूसरी लेवी लगाने से निवेश और विश्वास में कमी आ रही है। हर राज्य में टैक्स की दर अलग है और इससे अनावश्यक स्पर्धा और पूरे देश में खनिज कारोबार के लिए समान व्यवस्था नहीं बन पा रही है। सिर्फ 8 राज्यों में ही 97.59% खनिज उत्पादन है।

Updated on:
11 Aug 2026 05:33 am
Published on:
11 Aug 2026 05:21 am