
CJP leaders Custody: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की हिरासत (कस्टडी) से जुड़े मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार का पक्ष रखते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने "प्रत्यक्षं किम् प्रमाणम्" (यानी जो प्रत्यक्ष है, उसे प्रमाण की क्या आवश्यकता) का मुहावरा इस्तेमाल किया।
यह टिप्पणी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे CJP के विरोध-प्रदर्शनों, धारा 163 (पहले 144) लागू होने और CJP नेता आशुतोष रांका, सौरव दास की कस्टडी को लेकर चल रही कानूनी बहस के संदर्भ में की गई है।
दिल्ली पुलिस और सरकारी वकीलों ने कोर्ट में हलफनामा दायर कर CJP के प्रदर्शनों को कानून-व्यवस्था (Law and Order) के लिए खतरा बताया है। पुलिस का कहना है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में बार-बार प्रदर्शन बुलाना कानून के प्रति सम्मान की कमी दिखाता है। सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था की जो स्थिति जमीन पर बनी, वह सभी के सामने बिल्कुल स्पष्ट है।
ASG चेतन शर्मा ने इस संस्कृत सूक्ति का उपयोग यह रेखांकित करने के लिए किया कि प्रदर्शनों के दौरान बनी स्थिति सभी के सामने प्रत्यक्ष है। सरकार का मानना है कि पुलिस द्वारा की गई प्रिवेंटिव कस्टडी (निवारक हिरासत) की कार्रवाई को सही ठहराने के लिए वह स्थिति अपने आप में एक बड़ा प्रमाण है। यानी सरकार के अनुसार, जमीनी हालात खुद कार्रवाई की वैधता की गवाही देते हैं।
इस मामले का एक अहम पहलू न्यायिक हिरासत से जुड़ा है। दिल्ली के स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं के तहत कार्रवाई करते हुए CJP नेताओं की न्यायिक हिरासत को बढ़ाया है।
CJP के वकीलों और विपक्षी नेताओं ने इसे 'अवैध हिरासत' बताते हुए अदालत में हिरासत बढ़ाने को चुनौती देने की दायर याचिका वापस ले ली। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार के तहत की गई गतिविधियों पर इस तरह की कार्रवाई उचित नहीं है। CJP के नेताओं ने आरोप लगाया कि ,सरकार देश के नागरिकों के संवैधानिक अधिकार को कुचलना चाहती है। इसलिए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को लेकर सख्ती बरत रही है।