
मालिकाना हक पर विवाद,तो भी मिलेगा बिजली कनेक्शन: इलाहाबाद हाई कोर्ट, Photo Source@ChatGpt
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि बिजली व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता है। बिजली मिलना व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन का अहम हिस्सा है और इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा हासिल है। कोर्ट के मुताबिक, यदि आवेदक क्षतिपूर्ति फॉर्म (इंडिमनिटी फॉर्म) भरने और सभी शर्तें मानने को तैयार है, तो संपत्ति के मालिकाना हक पर सिविल कोर्ट में विवाद चलने के आधार पर उसे बिजली कनेक्शन से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा कि बिजली का अधिकार 'जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता' से जुड़ा है, क्योंकि यह लोगों को मानवीय गरिमा के साथ जीने में मदद करता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले में राकेश कुमार मिश्रा की याचिका स्वीकार कर ली। उन्होंने उत्तर प्रदेश के रायबरेली में एक संपत्ति पर नया घरेलू बिजली कनेक्शन मांगा था, जिसे अधिकारियों ने खारिज कर दिया था। जिस संपत्ति पर वे रह रहे हैं, उसके मालिकाना हक का विवाद रायबरेली के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की अदालत में चल रहा है।
इस साल जुलाई में बिजली विभाग के अधिकारियों ने यह कहकर आवेदन खारिज कर दिया कि मिश्रा ने अधिकार साबित करने वाला कोई दस्तावेज, जैसे रजिस्टर्ड सेल डीड, सक्सेशन सर्टिफिकेट या NOC, नहीं दिया। इसे चुनौती देते हुए उन्होंने 'इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड, 2005' के क्लॉज़ 4.4 का हवाला देकर हाई कोर्ट का रुख किया, जिसमें आवेदक को 'एनेक्सचर 4.2' के तहत इंडिमनिटी फॉर्म जमा करने की अनुमति है।
कोर्ट ने पाया कि यह कोड मालिकाना हक के अलावा 'कब्जे के प्रमाण' को भी मान्यता देता है। इसमें वैध पावर ऑफ अटॉर्नी, हाल की किराया रसीद, वैध लीज डीड या इंडिमनिटी फॉर्म शामिल हो सकते हैं। बेंच ने कहा कि जमीन का मालिक न होने वाला व्यक्ति भी, बकाया चुकाने और इंडिमनिटी बॉन्ड जमा करने को तैयार हो, तो कनेक्शन का हकदार हो सकता है। निजी प्रतिवादी ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता मालिक नहीं है और लंबित दीवानी मुकदमे के कारण कनेक्शन नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने इसे पर्याप्त आधार नहीं माना।
बेंच ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 में 'जीवन' केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं, बल्कि उन सभी स्थितियों को समेटता है जो इंसान को गरिमा से जीने लायक बनाती हैं। कोर्ट ने कहा कि बिजली रोशनी, पानी, खाना पकाने, रेफ्रिजरेशन, संचार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका में मदद करती है। सुप्रीम कोर्ट के 'चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995)' फैसले का जिक्र करते हुए, जिसमें आवास के अधिकार को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया था, कोर्ट ने बिजली को गरिमापूर्ण जीवन में सहायक अहम सुविधा बताया।
Updated on:
21 Oct 2026 03:54 pm
Published on:
21 Oct 2026 03:54 pm
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