Mayawati Congress Meeting: लोकसभा चुनाव 2029 और यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। राहुल गांधी के यूपी दौरे और मायावती से मुलाकात की कोशिशों ने सपा-बसपा-कांग्रेस के संभावित समीकरणों को लेकर सियासी चर्चाएं तेज कर दी हैं।
Rahul Gandhi: पश्चिम बंगाल, बिहार, दिल्ली, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2029 की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने यूपी से इसकी तैयारी शुरू कर दी है। दरअसल, बंगाल, हरियाणा और दिल्ली में विपक्ष के अलग-अलग चुनाव लड़ने से नुकसान हुआ था और बीजेपी ने जीत दर्ज की थी।
लोकसभा चुनाव 2029 से पहले उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव को लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाएगा। इसके लिए कांग्रेस तैयार हो गई है। बिहार, दिल्ली और हरियाणा में कांग्रेस ने जो गलती की थी, वह अब यूपी में नहीं करना चाहती है। यही वजह है कि कांग्रेस सांसद राहुल गांधी यूपी के दौरे पर है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और सपा का गठबंधन है। लोकसभा चुनाव 2024 में दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने मिलकर चुनाव प्रचार किया और इसका असर सीटों पर साफ दिखाई दिया। इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
हालांकि, इस पूरी रणनीति में बसपा अलग-थलग नजर आई। बीएसपी का वोट प्रतिशत भले घटा हो, लेकिन दलित वोट बैंक पर उसकी पकड़ अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं मानी जाती। यही वजह है कि कांग्रेस अब बसपा को पूरी तरह विरोधी खेमे में धकेलने से बचती दिख रही है।
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी इन दिनों यूपी के दौरे पर हैं। इसी बीच बुधवार को बसपा प्रमुख मायवाती से मिलने के लिए कांग्रेस नेता पहुंचे। हालांकि कांग्रेस नेताओं की मायावती से मुलाकात नहीं हो पाई। बताया जा रहा है कि ये नेता राहुल गांधी के कोई खास संदेश लेकर पहुंचे थे। लेकिन मायावती ने पहले अप्वाइंटमेंट लेकर आने की बात कही। इसके बाद प्रदेश में सियासी हलचल तेज हो गई है।
लखनऊ में बसपा प्रमुख के आवास पर मिलने पहुंचे नेताओं में कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल और बाराबंकी सांसद तनुज पूनिया समेत कई बड़े नेता शामिल थे। मुलाकात नहीं होने पर कांग्रेस नेताओं की तरफ से प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने बताया कि वे सिर्फ औपचारिक मुलाकात के लिए गए थे।
कांग्रेस नेताओं के मायवाती से मिलने जाने के बाद तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव 2029 और यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले कांग्रेस विपक्षी दलों को एकजुट करने का प्रयास कर रही हैं। हालांकि पहले ही मायवती ने ऐलान कर दिया है कि 2027 में उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी और किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं रहेगी।
मायावती का कहना है कि जब भी उन्होंने गठबंधन किया है, तब उनकी पार्टी को नुकसान हुआ है। उनका कहना है कि बसपा का वोट दूसरे दलों को ट्रांसफर हो जाता है।
कांग्रेस नेताओं का मायावती से मिलने का दूसरा मतलब भी निकाला जा रहा है। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में सीटों के लिए कांग्रेस सपा पर दबाव बना रही है। क्योंकि बिहार में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और राजद के बीच सीट बंटवारे को लेकर काफी समय तक खींचतान रही थी। यही वजह रही कि कई सीटों पर दोनों पार्टियों के बीच फ्रेंडली मुकाबला भी हुआ और चुनाव में इसका नुकसान भी उठाना पड़ा।
अब यूपी में भी कांग्रेस सीट बंटवारे में अखिलेश यादव की पार्टी सपा पर दबाव बनाना चाहती है। मायावती से मुलाकात कर सपा पर दबाव डाल सकती है।
हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ा था और दोनों ही जगहों पर हार का सामना करना पड़ा। वहीं बंगाल में भी टीएमसी से अलग होकर चुनाव लड़ा था इस जगह भी टीएमसी और कांग्रेस को हार का सामना पड़ा।
अब कांग्रेस यूपी में दिल्ली, हरियाणा और बंगाल वाली गलती नहीं करना चाहती है। यही वजह है कि कांग्रेस सपा और बसपा को साथ लेकर चलना चाहती है।
कांग्रेस को यह समझ आ चुका है कि यूपी में अकेले दम पर वापसी आसान नहीं है। सपा के साथ गठबंधन से उसे मुस्लिम और यादव वोटों का फायदा मिला, लेकिन दलित वोट बैंक तक पहुंच अभी भी सीमित है। यही कारण है कि पार्टी अब दलित राजनीति को लेकर ज्यादा सतर्क नजर आ रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की कोशिश दो स्तर पर चल रही है। पहला, दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना और दूसरा, भविष्य में जरूरत पड़ने पर बसपा के साथ किसी समझौते की जमीन तैयार रखना।
फिलहाल बसपा ने किसी भी विपक्षी गठबंधन से दूरी बना रखी है। मायावती कई बार सपा और कांग्रेस दोनों पर हमला बोल चुकी हैं। इसके बावजूद राजनीति में स्थायी दोस्ती और दुश्मनी नहीं होती। यदि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव या 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं, तो नए समीकरण बनने से इनकार नहीं किया जा सकता।